कुरआन और हदीस की बाते

कुरआन और हदीस की बाते Dawah-calling to Allah

🕊️ मैयत को दफ़्न करने का सुन्नत तरीका — कब्र में क्या करें और क्या न करें?मौत के बाद इंसान के लिए सबसे अहम काम यह है कि ...
05/09/2026

🕊️ मैयत को दफ़्न करने का सुन्नत तरीका — कब्र में क्या करें और क्या न करें?

मौत के बाद इंसान के लिए सबसे अहम काम यह है कि मैयत को इज़्ज़त और सुन्नत के मुताबिक़ जल्द दफ़्न किया जाए। इस मौके पर रस्मों से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम नबी ﷺ के बताए हुए तरीक़े पर अमल करें।

🕊️ मौत से दफ़्न तक के अहम सुन्नत अमल

🔹 1. ग़ुस्ल देना
मैयत को शरीअत के मुताबिक़ ग़ुस्ल दिया जाए और पाक-साफ़ कफ़न पहनाया जाए। नबी ﷺ ने ग़ुस्ल में विषम संख्या का ज़िक्र फ़रमाया है।

🔹 2. नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना
मैयत की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी जाए और उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ की जाए।

🔹 3. दफ़्न में देर न करना
नबी ﷺ ने जनाज़े को जल्दी ले जाने की हिदायत दी है।

🪦 कब्र में कैसे रखें?

मैयत को कब्र में दाहिनी करवट क़िबला की तरफ़ रखा जाए और रखते समय पढ़ा जा सकता है:

بِسْمِ اللهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللهِ ﷺ

“अल्लाह के नाम से और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन पर।”

🤲 दफ़्न के बाद सबसे अहम काम

कब्र के पास खड़े होकर मैयत के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करना सुन्नत है।

नबी ﷺ दफ़्न के बाद फ़रमाते थे:

“अपने भाई के लिए मग़फ़िरत की दुआ करो और उसके लिए साबित-क़दमी माँगो, क्योंकि अब उससे सवाल किया जा रहा है।”

इसलिए दफ़्न के बाद कुछ देर रुककर दिल से मैयत के लिए दुआ करें।

❌ कब्र पर क्या नहीं करना चाहिए?

❌ कब्र पर अज़ान को सुन्नत समझकर न दें — इसके लिए कोई स्पष्ट सहीह हदीस साबित नहीं है।

❌ कब्र को सजाना, पक्का करना या उस पर इमारत बनाना नहीं।

❌ कब्र पर बैठना या उसे बेअदबी से रौंदना नहीं।

❌ मैयत से मदद या फ़रियाद न करें; दुआ सिर्फ़ अल्लाह से करें।

📖 कब्र पर क़ुरआन पढ़ना?

इस मसले में उलमा के बीच इख़्तिलाफ़ है। कुछ उलमा कब्र के पास क़ुरआन पढ़ने को जायज़/मुस्तहब मानते हैं, जबकि दूसरे उलमा इसे नबी ﷺ से स्पष्ट रूप से साबित सुन्नत नहीं मानते। इसलिए इसे सर्वसम्मत सुन्नत बताना सही नहीं।

जो बात साफ़ तौर पर सुन्नत से साबित है, वह है—दफ़्न के बाद मैयत के लिए दुआ और इस्तिग़फ़ार करना।

🤲 अल्लाह तआला हमारे मरहूमों की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी कब्रों को रोशन और कुशादा फ़रमाए और हमें क़ुरआन व सहीह सुन्नत के मुताबिक़ अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

❤️ इस पोस्ट को आगे शेयर करें, ताकि किसी को दफ़्न के सही सुन्नत तरीके की जानकारी मिल सके।

कुरान और हदीस की बातें
Edit By Jubair Khan

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🔥 यतीम का माल मत खाओ — यह दौलत नहीं, आग है! 🔥📖 अल्लाह तआला फरमाता है:إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَىٰ ...
05/09/2026

🔥 यतीम का माल मत खाओ — यह दौलत नहीं, आग है! 🔥

📖 अल्लाह तआला फरमाता है:

إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَىٰ ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا ۖ وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًا

तर्जुमा:
“बेशक जो लोग यतीमों का माल ज़ुल्म के साथ खाते हैं, वे अपने पेटों में वास्तव में आग भरते हैं और जल्द ही भड़कती हुई आग में दाखिल होंगे।”

📚 सूरह अन-निसा — 4:10

⚠️ सोचने वाली बात:
यतीम का माल हड़प लेना सिर्फ़ दुनिया में किसी का हक़ मारना नहीं, बल्कि आख़िरत की बहुत बड़ी तबाही का सबब है।

🤲 यतीम के माल की हिफ़ाज़त करें, उनका हक़ उन्हें दें और अल्लाह के अज़ाब से डरें।

❤️ किसी एक इंसान तक यह पैग़ाम ज़रूर पहुँचाएँ।

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04/09/2026

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🕌 जुम्मे के ख़ुत्बे में ख़ामोश रहना क्यों ज़रूरी है?जुम्मे का ख़ुत्बा सिर्फ़ एक बयान नहीं, बल्कि अल्लाह ﷻ की तरफ़ से नसी...
04/09/2026

🕌 जुम्मे के ख़ुत्बे में ख़ामोश रहना क्यों ज़रूरी है?

जुम्मे का ख़ुत्बा सिर्फ़ एक बयान नहीं, बल्कि अल्लाह ﷻ की तरफ़ से नसीहत और हिदायत का ज़रिया है। इसलिए इस दौरान पूरी तवज्जोह के साथ ख़ामोशी से सुनना ज़रूरी है।

📖 हदीस:

हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"जब इमाम जुम्मे का ख़ुत्बा दे रहा हो और तुम अपने साथी से यह भी कहो कि 'ख़ामोश रहो', तो तुमने भी बेकार बात (लग़्व) की।"

📚 सहीह अल-बुख़ारी: 934
📚 सहीह मुस्लिम: 851

🌿 तफ़्सीर व तशरीह:

उलमा ने लिखा है कि इस हदीस का मक़सद जुम्मे के ख़ुत्बे की अहमियत को बयान करना है। जब दूसरों को चुप कराने के लिए भी बोलना मना है, तो आम बातचीत, मोबाइल चलाना, मैसेज पढ़ना, हँसी-मज़ाक करना या इधर-उधर ध्यान लगाना और भी ज़्यादा नापसंदीदह अमल है।

इमाम इब्न हजर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि इस हदीस से मालूम होता है कि ख़ुत्बे के दौरान इंसान को पूरी तरह मुतवज्जेह रहना चाहिए और हर उस काम से बचना चाहिए जो ख़ुत्बे को सुनने में रुकावट बने।

✨ याद रखिए:
जुम्मे की बरकतें पाने के लिए सिर्फ़ मस्जिद पहुँचना काफ़ी नहीं, बल्कि ख़ुत्बे को ग़ौर से सुनना और उस पर अमल करने का इरादा करना भी ज़रूरी है।

🤲 अल्लाह तआला हमें जुम्मे के आदाब की पाबंदी करने और ख़ुत्बे से पूरा फ़ायदा उठाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

🌙 जुमे के दिन क़ुबूलियत की ख़ास घड़ी 🤲📜 नबी ﷺ ने फ़रमाया:«إِنَّ فِي الْجُمُعَةِ لَسَاعَةً، لَا يُوَافِقُهَا عَبْدٌ مُسْل...
03/09/2026

🌙 जुमे के दिन क़ुबूलियत की ख़ास घड़ी 🤲

📜 नबी ﷺ ने फ़रमाया:

«إِنَّ فِي الْجُمُعَةِ لَسَاعَةً، لَا يُوَافِقُهَا عَبْدٌ مُسْلِمٌ، وَهُوَ قَائِمٌ يُصَلِّي، يَسْأَلُ اللَّهَ شَيْئًا، إِلَّا أَعْطَاهُ إِيَّاهُ»

तर्जुमा:
“बेशक जुमे के दिन एक ऐसी घड़ी है कि कोई मुसलमान बंदा उस घड़ी को पा ले और नमाज़ की हालत में अल्लाह से कोई चीज़ माँगे, तो अल्लाह उसे वह चीज़ ज़रूर अता फ़रमाता है।”

📚 सहीह बुख़ारी — हदीस नं. 935
📚 सहीह मुस्लिम — हदीस नं. 852

🤲 इसलिए जुमे के दिन ख़ास तौर पर दुआ का एहतिमाम करें।
अपने लिए, अपने वालिदैन, घरवालों और पूरी उम्मते-मुस्लिमा के लिए दुआ करें।

अल्लाह तआला हमारी तमाम जायज़ दुआओं को क़ुबूल फ़रमाए। आमीन। 🤲

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🌙 सीरत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ | पार्ट 15🕌 मदीना में पहला मरकज़ — मस्जिद-ए-नबवी ﷺ की तामीरमदीना मुनव्वरा पहुँचने के बाद रसूलुल्लाह ...
03/09/2026

🌙 सीरत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ | पार्ट 15

🕌 मदीना में पहला मरकज़ — मस्जिद-ए-नबवी ﷺ की तामीर

मदीना मुनव्वरा पहुँचने के बाद रसूलुल्लाह ﷺ ने मस्जिद-ए-नबवी ﷺ की तामीर फ़रमाई।

यह सिर्फ़ एक मस्जिद की तामीर नहीं थी, बल्कि मुसलमानों की नई ज़िंदगी, इबादत, इल्म और उम्मत की तरबियत के एक महान मरकज़ की बुनियाद थी।

रसूलुल्लाह ﷺ खुद भी सहाबा किराम رضي الله عنهم के साथ मस्जिद की तामीर में हिस्सा लेते और ईंटें उठाते थे। सहाबा के साथ मिलकर अपने हाथों से मस्जिद बनाना नबी ﷺ की सादगी और उम्मत के लिए अमली नमूना था।

📖 हदीस:
हज़रत अनस رضي الله عنه से रिवायत है कि नबी ﷺ मदीना तशरीफ़ लाए और वहाँ मस्जिद की तामीर की गई।

📚 सहीह अल-बुख़ारी — हदीस 393

✨ सीरत से सबक:
मदीना में इस्लामी समाज की बुनियाद मस्जिद से रखी गई—जहाँ इबादत के साथ इल्म, अख़लाक़ और उम्मत की तरबियत होती थी।

🤲 अल्लाह हमें मस्जिदों से मोहब्बत करने और नबी ﷺ की सुन्नत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

❤️ पार्ट 16 के लिए पेज को फ़ॉलो करें।

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🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा का मुकम्मल सुन्नत तरीका🌙 इमाम के पीछे खड़े मुक़्तदियों के लिए — नियत से सलाम तकजनाज़े की नमाज़ कैसे पढ़...
03/09/2026

🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा का मुकम्मल सुन्नत तरीका

🌙 इमाम के पीछे खड़े मुक़्तदियों के लिए — नियत से सलाम तक

जनाज़े की नमाज़ कैसे पढ़ें?
आइए इसे बिल्कुल आसान तरीके से समझते हैं।

━━━━━━━━━━━━━━━━━━

🟢 1️⃣ सबसे पहले नियत

मुक़्तदी दिल में नियत करे:

“मैं अल्लाह के लिए इस मय्यित की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ता हूँ और इस इमाम की पैरवी करता हूँ।”

नियत के लिए कोई खास अरबी जुमला रसूलुल्लाह ﷺ से साबित नहीं। नियत दिल के इरादे का नाम है।

फिर क़िब्ला की तरफ़ खड़े हों और इमाम की पैरवी के लिए तैयार रहें।

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🟢 2️⃣ पहली तकबीर

इमाम “الله أكبر” कहे तो मुक़्तदी भी “الله أكبر” कहे।

इसके बाद सूरह फ़ातिहा पढ़ी जाए।

हज़रत इब्न अब्बास رضي الله عنهما ने जनाज़े की नमाज़ में सूरह फ़ातिहा पढ़ी और फ़रमाया:

“ताकि तुम जान लो कि यह सुन्नत है।”

📚 सहीह अल-बुखारी — हदीस 1335

➡️ इसलिए जनाज़े की नमाज़ में फ़ातिहा पढ़ना सहीह हदीस से साबित है।

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🟢 3️⃣ दूसरी तकबीर

इमाम दूसरी बार:

“الله أكبر”

कहे तो मुक़्तदी भी तकबीर कहे।

इसके बाद रसूलुल्लाह ﷺ पर दरूद पढ़े।

मसलन:

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ...

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🟢 4️⃣ तीसरी तकबीर — सबसे अहम हिस्सा 🤲

इमाम तीसरी बार:

“الله أكبر”

कहे तो मुक़्तदी भी तकबीर कहे।

अब मय्यित के लिए ख़ुलूस के साथ दुआ करे।

रसूलुल्लाह ﷺ जनाज़े में यह दुआ करते थे:

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ...

तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, इस पर रहम फ़रमा, इसे आफ़ियत दे और इसे माफ़ कर दे। इसकी मेहमाननवाज़ी इज़्ज़त के साथ फ़रमा, इसकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा और इसे पानी, बर्फ़ और ओलों से धोकर गुनाहों से ऐसे पाक कर दे जैसे सफ़ेद कपड़े को मैल से पाक किया जाता है।”

📚 सहीह मुस्लिम — हदीस 963a/963d

➡️ अगर पूरी दुआ याद न हो तो जितनी दुआ याद हो, मय्यित के लिए मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करे।

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🟢 5️⃣ चौथी तकबीर

इमाम चौथी बार:

“الله أكبر”

कहे तो मुक़्तदी भी “الله أكبر” कहे।

नबी ﷺ से जनाज़े में चार तकबीरें साबित हैं।

📚 सहीह मुस्लिम — हदीस 952a

इसके बाद इमाम सलाम फेरे और मुक़्तदी भी सलाम फेरकर नमाज़ पूरी करे।

---

❌ जनाज़े की नमाज़ में क्या नहीं है?

जनाज़े की नमाज़ में:

❌ रुकू नहीं
❌ सज्दा नहीं
❌ अज़ान नहीं
❌ इक़ामत नहीं
❌ चार रकअत नहीं

बल्कि यह क़ियाम में पढ़ी जाने वाली नमाज़ है, जिसमें तकबीरें और मय्यित के लिए दुआ की जाती है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने नजाशी رضي الله عنه की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई और चार तकबीरें कहीं।

---

📌 मुक़्तदी के लिए पूरा क्रम याद रखें

नियत → पहली तकबीर → फ़ातिहा → दूसरी तकबीर → दरूद → तीसरी तकबीर → मय्यित के लिए दुआ → चौथी तकबीर → सलाम

🤲 असल मक़सद

जनाज़े की नमाज़ सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि अपने मुस्लिम भाई या बहन के लिए मग़फ़िरत, रहमत और निजात की दुआ है।

नबी ﷺ ने जनाज़े की नमाज़ में मय्यित के लिए दुआ की और सहाबा को भी मय्यित के लिए दुआ करने की तालीम दी।

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📖 दलील: क़ुरआन और सहीह सुन्नत
❤️ कुरआन और हदीस की बातें
✍️ Edit By Jubair Khan

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🌙 कमज़ोर औलाद और यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में अल्लाह का हुक्म 🌙📖 सूरह अन-निसा — आयत 9وَلْيَخْشَ الَّذِينَ لَوْ تَرَكُوا...
03/09/2026

🌙 कमज़ोर औलाद और यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में अल्लाह का हुक्म 🌙

📖 सूरह अन-निसा — आयत 9

وَلْيَخْشَ الَّذِينَ لَوْ تَرَكُوا مِنْ خَلْفِهِمْ ذُرِّيَّةً ضِعَافًا خَافُوا عَلَيْهِمْ فَلْيَتَّقُوا اللَّهَ وَلْيَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا

📜 तर्जुमा

“और उन लोगों को डरना चाहिए कि अगर वे अपने पीछे कमज़ोर औलाद छोड़ जाते, तो उन्हें उनकी फ़िक्र होती। पस उन्हें चाहिए कि अल्लाह से डरें और सीधी, दुरुस्त बात कहें।”

📖 सूरह अन-निसा — 4:9

🌿 तफ़्सीर इब्ने कसीर

हज़रत इब्ने अब्बास رضي الله عنهما से इस आयत की तफ़्सीर में मर्वी है कि यह उस शख़्स के बारे में है जो किसी मरने वाले के पास मौजूद हो और वह ऐसी वसीयत कर रहा हो जिससे उसके वारिसों को नुक़सान पहुँच सकता हो। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह अल्लाह से डरे और ऐसी सही वसीयत की तरफ़ रहनुमाई करे जिससे वारिसों पर ज़ुल्म न हो।

इमाम इब्ने कसीर رحمه الله ने हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास رضي الله عنه की हदीस भी बयान की है। उन्होंने नबी ﷺ से अपने माल के बारे में पूछा कि क्या मैं दो-तिहाई सदक़ा कर दूँ? आपने ﷺ फ़रमाया: “नहीं।” फिर आधा पूछा, आपने ﷺ फ़रमाया: “नहीं।” फिर एक-तिहाई की इजाज़त दी और फ़रमाया:

“एक-तिहाई, और एक-तिहाई भी बहुत है।”

फिर नबी ﷺ ने फ़रमाया कि अपने वारिसों को ख़ुशहाल छोड़ना इस बात से बेहतर है कि उन्हें लोगों के सामने हाथ फैलाने के लिए मजबूर छोड़ो।

📚 तफ़्सीर इब्ने कसीर — सूरह अन-निसा, आयत 9

💡 इस आयत से क्या सबक़ मिलता है?

🔹 जिस तरह हम चाहते हैं कि हमारी मौत के बाद हमारी औलाद सुरक्षित और ख़ुशहाल रहे, उसी तरह हमें दूसरों की कमज़ोर औलाद और यतीमों के हक़ का भी ख़याल रखना चाहिए।

🔹 वसीयत करते या करवाते समय अल्लाह से डरना चाहिए और किसी वारिस के साथ ज़ुल्म नहीं करना चाहिए।

🔹 ऐसी बात कहनी चाहिए जो सच्ची, दुरुस्त और इंसाफ़ वाली हो।

🔹 किसी मरने वाले को ऐसी वसीयत करने पर मजबूर नहीं करना चाहिए जिससे उसके हक़दार वारिसों को नुक़सान पहुँचे।

🔹 माल के मामले में रिश्तेदारों और कमज़ोर लोगों के हक़ का ख़याल रखना तक़वा का हिस्सा है।

⚠️ एक अहम बात

इस आयत में सिर्फ़ यतीमों की हिफ़ाज़त का सबक़ नहीं, बल्कि अपने पीछे कमज़ोर औलाद छोड़ जाने की फ़िक्र को सामने रखकर दूसरों के कमज़ोर बच्चों के साथ इंसाफ़ करने की ताकीद भी है।

आज हम अपनी औलाद के मुस्तक़बिल की फ़िक्र करते हैं—तो क्या हमें दूसरों की औलाद के हक़ का भी उतना ही ख़याल है?

🤲 अल्लाह तआला हमें यतीमों, कमज़ोरों और अपने तमाम रिश्तेदारों के हक़ अदा करने, इंसाफ़ करने और हमेशा सही बात कहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

📖 सूरह अन-निसा — 4:9
📚 तफ़्सीर: इब्ने कसीर

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🌙 कुरआन और हदीस की बातें
✍️ Edit By Jubair Khan

🌙 सीरत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ — पार्ट 14🤝 मदीना मुनव्वरा में मुहाजिरीन और अंसार का भाईचाराजब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ ला...
02/09/2026

🌙 सीरत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ — पार्ट 14

🤝 मदीना मुनव्वरा में मुहाजिरीन और अंसार का भाईचारा

जब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ लाए, तो आपने इस्लामी समाज की बुनियाद मज़बूत करने के लिए मुहाजिरीन और अंसार के दरमियान भाईचारा कायम फ़रमाया।

अंसार ने अपने मुहाजिर भाइयों के साथ ऐसी मोहब्बत, ईसार और हमदर्दी का मुज़ाहिरा किया कि अपने माल और घर तक में उन्हें शरीक करने के लिए तैयार हो गए।

📖 हदीस शरीफ़

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضي الله عنه बयान करते हैं कि जब नबी ﷺ ने उनके और हज़रत सअद बिन रबीअ رضي الله عنه के बीच भाईचारा कायम फ़रमाया, तो हज़रत सअद رضي الله عنه ने कहा:

“मैं अंसार में सबसे ज़्यादा मालदार हूँ, मेरा माल तुम्हारे और मेरे दरमियान आधा-आधा है।”

हज़रत अब्दुर्रहमान رضي الله عنه ने जवाब दिया:

“अल्लाह तुम्हारे माल और घरवालों में बरकत दे। मुझे बाज़ार का रास्ता बता दीजिए।”

📚 सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नं. 2048

🌹 इस वाक़िए से हमें सबक मिलता है:
सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि मोहब्बत, ईसार, मदद और भाईचारे का नाम भी है।

अल्लाह तआला हमें सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم की मोहब्बत और उनके किरदार से सबक लेने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन 🤲

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📌 सीरत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ | पार्ट 14
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🌿 औरत की मय्यत को ग़ुस्ल देने का सुन्नती तरीका 🌿कुरआन व सहीह अहादीस की रोशनी मेंमय्यत को ग़ुस्ल देना एक अहम जिम्मेदारी ह...
02/09/2026

🌿 औरत की मय्यत को ग़ुस्ल देने का सुन्नती तरीका 🌿

कुरआन व सहीह अहादीस की रोशनी में

मय्यत को ग़ुस्ल देना एक अहम जिम्मेदारी है। औरत की मय्यत को ग़ुस्ल देते समय पर्दे, इज़्ज़त और पूरी एहतियात का खास ध्यान रखा जाए।

🕊️ ग़ुस्ल देने का पूरा तरीका

1️⃣ नजासत साफ़ करें
अगर मय्यत के शरीर पर कोई नजासत हो तो पहले उसे साफ़ करें और सतर को ढककर रखें।

2️⃣ वुज़ू कराएँ
मय्यत को नमाज़ के वुज़ू की तरह वुज़ू कराया जाए। मुँह और नाक में सीधे पानी डालने के बजाय गीले कपड़े से सफाई की जाए।

3️⃣ सिर और बाल धोएँ
सिर और बालों को पानी और बेर के पत्तों (सिद्र) से धोया जाए। सिद्र उपलब्ध न हो तो साफ पानी और मुनासिब चीज़ इस्तेमाल की जा सकती है।

4️⃣ पहले दाहिना हिस्सा धोएँ
पहले शरीर के दाहिने हिस्से को अच्छी तरह धोया जाए।

5️⃣ फिर बायाँ हिस्सा धोएँ
दाहिने हिस्से के बाद बाएँ हिस्से को धोया जाए और पानी शरीर के हर हिस्से तक पहुँचाया जाए।

6️⃣ विषम संख्या में ग़ुस्ल दें
मय्यत को 3, 5 या 7 बार ग़ुस्ल देना बेहतर है; जरूरत के अनुसार इससे अधिक भी किया जा सकता है।

7️⃣ आख़िरी ग़ुस्ल में काफ़ूर
आख़िरी बार पानी में काफ़ूर मिलाना सुन्नत से साबित है।

8️⃣ शरीर को सुखाएँ
ग़ुस्ल पूरा होने के बाद मय्यत के शरीर को साफ कपड़े से हल्के हाथ से सुखाया जाए।

9️⃣ कफ़न पहनाएँ
ग़ुस्ल और सुखाने के बाद मय्यत को शरीअत के मुताबिक़ कफ़न पहनाया जाए।

🔟 मय्यत के लिए दुआ करें 🤲
ग़ुस्ल के बाद मय्यत के लिए मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करें।

📜 हदीस

हज़रत उम्मे अतिय्या رضي الله عنها से रिवायत है कि नबी ﷺ ने अपनी बेटी को ग़ुस्ल देने के बारे में फ़रमाया कि उसे तीन, पाँच या आवश्यकता के अनुसार उससे अधिक बार ग़ुस्ल दिया जाए और आख़िरी बार काफ़ूर इस्तेमाल किया जाए।

📚 सहीह बुख़ारी: 1253
📚 सहीह मुस्लिम: 939

⚠️ कुछ अहम बातें

• मय्यत के साथ हर हाल में नर्मी और पूरी इज़्ज़त का मामला रखा जाए।
• मय्यत का सतर ढका रहे और गैर-ज़रूरी लोगों को मौजूद न रखा जाए।
• मय्यत के ऐब या निजी बातें दूसरों के सामने बयान न की जाएँ।
• ग़ुस्ल और कफ़न के मसाइल में अपने मज़हब के भरोसेमंद आलिम/मुफ्ती से भी रहनुमाई ली जा सकती है, क्योंकि कुछ फ़िक़्ही विवरणों में मतभेद पाया जाता है।

🤲 अल्लाह तआला हमारे सभी मरहूमीन की मग़फ़िरत फरमाए, उनकी कब्रों को रोशन फरमाए और हमें सुन्नत के मुताबिक़ अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

कुरआन और हदीस की बातें
Edit By Jubair Khan

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