01/08/2025
#खोरठा पढ़ने-लिखने वालों या खोरठा को जानने के उत्सुक लोगों के लिए विशेष ध्यान देने योग्य बातें :-
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खोरठा पढ़ने-लिखने के इच्छुक विद्यार्थी/लेखक/नये उत्साही साथियों के लिए कुछ आवश्यक सुझाव मैं दे रहा हूँ ताकि वे खोरठा लेखन में वर्तनी संबंधी भूलों से बचकर खोरठा के मानक रूप का अनुपालन कर सकें।
खोरठा के स्वर वर्ण मूल रूप से आठ है -
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए और ओ।
खोरठा शब्दों के लेखन में इन्हीं स्वर वर्णों और उनकी मात्राओं का व्यवहार होता है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि नागरी वर्णमाला के ‘ऋ’, 'ऐ' और 'औ' वर्ण को खोरठा में इनकी ध्वनियों का व्यवहार नहीं है। जान लें -
(1) खोरठा में 'ऋ' के स्थान पर 'रि' या ‘री’ का व्यवहार होता है। जैसे - ऋण का ‘रीन’ ’ऋतु' का 'रितु’ 'पितृ' का ‘पितरी’ आदि।
(2) खोरठा 'ऐ' के स्थान पर उसके मूल रूप 'अइ' तथा 'औ' के लिए 'अउ’ का प्रयोग होता है।
जैसे - 'पैसा' का 'पइसा’ 'मैना' के स्थान पर ‘मइना’ 'मैदान’ का 'मइदान’ वैसे ही औजार का 'अउजार', कौआ का 'कउआ' मौसम का 'मउसम'।
(3) खोरठा में 'इ' और 'उ' का दो स्तरों पर व्यवहार होता है। एक उसके सामान्य रूप में जैसे - 'इसारा', इलची’, 'इसतक’ आदि। किंतु खोरठा शब्द निर्माण में स्वारगगम की विशेष प्रवृत्ति पायी जाती है। ’स्वरागम’ में ‘इ’ का प्रयोग लघु उच्चारण(ह्रस्वतर) भी होता है, जैसे - आइज, काइल, डाइर, कहलइ, अइलइ, माइन, गाइर आदि। इसी प्रकार 'उ' का सामान्य प्रयोग - उमइर, उदल, उपर, उदवासुत, उसकावेक, उलटा आदि। पर लाघव रूप में मउनी, कउआ, छउआ कहबउ, मारबउ, कहबउन, मारबउन आदि ।
(4) 'ई' और 'ऊ' का स्वतंत्र वर्ण रूप में प्रयोग नहीं है। मात्रा रूप में (की, कू) व्यंजन के साथ कम ही सही, पर प्रयोग है। शब्द के आरम्भ, मध्य या अंत में खोरठा उच्चारण के अनुसार इन दोनों दीर्घ स्वरों का मूल रूप में प्रयोग उचित नहीं है। 'ई' और 'ऊ' का प्रयोग शब्द के रूप में 'यह/वह' के बदले अवश्य कर सकते हैं।
पूर्व में दिये गये आठ मूल स्वरों के अतिरिक्त खोरठा में अवग्रह का भी व्यवहार किया जाता है। जैसे - देखऽ हलइ। गावऽ हलइ, हाँसऽ हलइ आदि। किंतु खोरठा के नवीन मानकों के अनुसार अब इसके स्थान पर ’ओ‘ (ो ) का व्यवहार किया जाने लगा है जैसे - देखो हलइ, गावो हलइ, हाँसो हलइ। तथापि पुराने लेखन में ऽ का प्रयोग देखा जा सकता है। यद्यपि ऐसे शब्दों लिए कई लेखक (समासचिन्ह/हाइफन) का प्रयोग करते हैं जैसे देख-हलइ। गाव-हलइ हाँस-हइ आदि।
वस्तुतः सामान्य शिक्षित जन अवग्रह ’ऽ‘ और - के संकेत से परिचित नहीं होते इसलिए पढ़ते समय इन चिन्हों के अनुसार उच्चारण नहीं कर पाते। जिससे वे भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए अवग्रह ’ऽ‘ या - के स्थान पर ’ओ‘ ( ो ) की मात्रा का व्यवहार अधिक उचित है। इस प्रसंग में यह जान लेना आवश्यक है कि दामोदर नदी के पश्चिमी-उत्तरवर्त्ती (पारनदिया)खोरठा क्षेत्रों में ’ऽ‘ के स्थान पर ओ ( ो ) का ही व्यवहार है।
गिरिडीह, कोडरमा, चतरा और कुछ-कुछ हजारीबाग क्षेत्र में 'खाइ गेलइ', 'जाइ लागल हइ' की जगह पर मूल क्रिया में इ प्रतय न जुड़ कर प्लुत उच्चारण होता है, जैसे- खाऽ गलइ, जाऽ रहल हइ। अर्थात् अवग्रह का प्रयोग इस रूप में भी पाया जाता है। यद्यपि इसे सीमावर्ती क्षेत्र में मगही के प्रभाव के रूप में देखा जाना चाहिए।
व्यंजन वर्ण - खोरठा में नागरी के निम्नलिखित व्यंजन वर्णों का व्यवहार किया जाता है -
'क’ वर्ग में - क ख ग घ
‘च’ वर्ग में - च छ ज झ ´
‘ट’ वर्ग में - ट ठ ड (ड़) ढ (ढ़)
‘त’ वर्ग में - त थ द ध न
'प’ वर्ग में - प फ ब भ म
मिश्रित व्यंजन समूह में - य, र, ल, व, स और ह ।
ध्यान दें -
(1) 'क' वर्ग का अनुनासिक ङ का व्यवहार खोरठा में नहीं होता (अब हिन्दी में भी नहीं) इसलिए इसको खोरठा वर्णमाला में नहीें रखा गया है। हालांकि क वर्गीय शेष चार ध्वनियों के पूर्व अनुस्वार हो तो ड० का उच्चारण स्वाभाविक रूप से होता है।
(2) 'च' वर्ग के अनुनासिक 'ञ' का प्रयोग खोरठा में 'इँ’ के रूप में होता है। जैसे - नाञ´ (नाइँ), कोराञ (कोराइँ) बेजाञ आदि।
यद्यपि 'ञ' के वास्तविक उच्चारण के अनुसार यह प्रयोग बहुत उचित नहीं है, तथापि खोरठा लेखन में इसका इसी रूप में आरंभ से व्यवहार होता आया है और आज भी जारी है; इसलिए 'ञ' को खोरठा वर्णमाला में इसी रूप में समझा जाना चाहिए।
(3) ’ट‘ वर्ग के अनुनासिक ’ण‘ का उच्चारण खोरठा में स्वतंत्र रूप से नहीं है, इसलिए इसे खोरठा वर्णमाला में स्थान नहीं मिला है। ’ण‘ के स्थान पर ’न‘ का व्यवहार होता है। जैसे - ऋण का ’रीन‘ ’कारण’ का ’कारन‘ ’मरण’ का ’मरन‘ कण का ’कन‘ आदि।
(4) अंतस्थ वर्ण ’य‘ और ’व‘ का खोरठा के मूल शब्दों के आरंभ में व्यवहार नहीं होता। पर मध्य या अंत में अवश्य होता है। शब्दारंभ
में 'य’ ज, इअ, या ए बन जाता है। वहीं 'व' 'ब', या 'ओ' में बदल जाता है।
जैसे-- यश - जस, यज्ञ - जइग, यकीन-एकिन
यत्न- जतन, योजना-जोजना,
योगी-जोगी। याद-इआद,
वैसे ही -
वन-बन/बोन, विनोद-बिनोद,
वस्तु-बसुत, विनय-बिनय, वीर-बीर
वजह- ओजह, वजन-ओजन,
वकील- ओकिल
(4) उष्म संघर्षी वर्णों में ’श‘, ’ष‘ का खोरठा में व्यवहार नहीं है। केवल ’स‘ का प्रयोग होता है। इसलिए अन्य भाषाओं से आये शब्दों में श, के स्थान पर स का व्यवहार होता है। जैसे -
शांति - सांति, शोभा - सोभा
मशीन - मिसिन/मिसीन, शिकार - सिकार
शनिवार - सनिचर, शिव - सिब
‘ष’ के बदले सामान्यतः ’स‘ का या ’ख‘ बिख या बिस, शोषण - सोसन
षष्ठी - खसठी, भाषा - भाखा/भासा
धनुष - धनुख/धेनुक
पुरुष -पुरुख/पुरुस
5. संयुक्ताक्षर - ’क्ष‘ ’त्र’ और ’ज्ञ‘ भी खोरठा में सामान्यतः व्यवहृत नहीं होते। क्ष के स्थान पर ख, छ, च्छ या क्छ के रूप में व्यवहार होता है।
जैसे - क्षति-खति, क्षमता- खेमोता
क्षय - खय पक्ष - पख/पइख
क्षेत्र- खेत/छेतर क्षत्रिय - खतरी
परीक्षा- परीच्छा/परीक्छा
‘ज्ञ’ के स्थान पर गिय/ ’गिअ’, ‘गेयँ’/गेअ या ‘ग’ का व्यवहार होता है। जैसे -
ज्ञान - गिआन, विज्ञान - बिगिआन
ज्ञान - गियान, गेआन, यज्ञ - जइग
‘त्र’ के स्थान पर सामान्यतः 'तर' का व्यवहार होता है, जैसे -
क्षेत्र-छेतर, मित्र- मितर त्रिया - तिरिया
पत्र- पतर यात्रा- जतरा शास्त्र- सास्तर
मंत्र - मंतर
परन्तु कुछ विशेष और पारिभाषिक शब्दों में 'त्र' का यथावत् व्यवहार होता है। जैसे - छात्र, पात्र आदि।
अन्य ध्वनि चिन्ह
1. र् ‘ ’ (रेफ) खोरठा में इस ध्वनि चिन्ह का व्यवहार होता है। जैसे - कार्हा, पीर्हा, खेर्हा, गोर्हा, आर्हान, गर्हन आदि।
2. रफला : खोरठा के ठेठ (मूल) शब्दों में रफला ( र्) का व्यवहार नहीं होता है। हिन्दी-संस्कृत या अन्य विदेशी भाषाओं से आए शब्दों का खोरठा की प्रकृति के अनुसार परिवर्तित रूप में प्रयोग होता है। फलतः शब्द की संरचना में ’ रफला ‘ के स्थान पर पूर्ण 'र' का व्यवहार होता है। देखें उदाहरण -
क्रम - करम, प्रयाग - परयाग
प्रीत - पिरित, प्राण - परान
अंग्रेज - अंगरेज ट्रक - टराक
उज्र - उजुर उम्र - उमइर आदि।
(3) ' ँ ' (चंद्रबिंदु): इस अनुनासिक ध्वनि चिन्ह का खोरठा में अत्यधिक प्रयोग होता है। जैसे - काँच, आँचर , बाँदर, हाँथी, हाँथ, हाँस, बाँस, घाँस, माँस, खाँची, माँची, नाइँ, माँय।
(4) ’ ं ‘ (अनुस्वार) - इस अनुनासिक चिन्ह का भी खोरठा में व्यवहार होता है, जैसे - कुंडल, मंगर, मंतर, जंतर, सइंगा, सइंखा आदि। स्वर व्यंजन की इन ध्वनियों का व्यवहार किया जाता है, जिनके लिए नागरी लिपि में कोई चिन्ह उपलब्ध नहीं है। जैसे -
’न’ का महाप्राण ’न्ह‘,
’म’ का महाप्राण - म्ह
’र‘ वर्ग का महाप्राण - र्ह,
’ल‘ का महाप्राण - ल्ह
इनका प्रयोग - नेन्हा, चिन्हा, पान्हा, अम्हा, जम्हड़ल, कार्हा, खेर्हा, आर्हान, पाल्हा, काल्हा, लेल्हा, पिल्ही, चाल्होसियार, लुल्ही आदि।
खोरठा शब्द निर्माण की प्रवृत्तियाँ :
खोरठा के वर्णों (ध्वनियों) से परिचित हो जाने के बाद अब हम खोरठा शब्द निर्माण की विशेष प्रवृत्तियों से अवगत होंगे। इसके लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
1. खोरठा शब्द निर्माण में व्यंजन वर्णों का संयुक्ताक्षर प्रयोग सामान्यतः नहीं होता। अर्थात वर्णों का प्रयोग अर्द्धरूप (स्वर रहित)में न होकर पूर्ण रूप में होता है। जैसे - शब्द का सबद, व्यवहार - बेवहार,
कर्म - करम , नर्क - नरक
काव्य- काइब, मुख्य - मुइख
संज्ञा - सइंगा अत्याचार - अतियाचार
बुद्धि - बुइध फुर्सत - फुरसइत
डाॅक्टर - डागदर ट्रक - टराक आदि।
खोरठा के मूल शब्दों में संयुक्ताक्षर का प्रयोग प्रायः नहीं होता अपितु हिन्दी संस्कृत या विदेशी भाषाओं से आगत शब्दों में भी सरलीकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है। अर्थात् अन्य भाषाओं के शब्द भी खोरठा की प्रकृति में ढलकर संयुक्ताक्षर विहीन हो जाते हैं। देखें - खोरठा के ठेठ शब्द - परपन, अजलइत, घींसट, पेचटल, उबरल, उँचगर, गसगर, चेठा, हूब, रउद आदि अन्य भाषाओं के शब्द
प्रकृति - परकीरति/परकिरति स्टेशन - टीसन
उम्र- उमइर , फिक्र -फिकिर
प्रयोग - परजोग/परयोग, योग्य - जोइग आदि।
2. स्वरभक्ति या स्वरागम की प्रवृत्ति : खोरठा शब्दों में स्वरभक्ति या स्वरागम की विशेष प्रवृत्ति पायी जाती है। अर्थात् शब्द के आरंभ, मध्य, या अंत में अतिरिक्त स्वर का आगम (आ जाना) खोरठा के मूल (ठेठ) शब्दों में यह प्रवृत्ति तो मिलती ही है बल्कि अन्य भाषा के शब्दों को भी इसी रूप में ढाल दिया जाता है।
देखें :-
ठेठ शब्द - गइज के, तुइब के, मइड़ के, राइत कहलइ, अइलइ, अजलइत, बेंड़ाइ, जुआइँठ, डाइर टाइर, आइर, पाइर आदि।
3. अन्य भाषा से आए शब्द - दाल का दाइल, आँख का आँइख, मुगालता - मोगलइत, फुर्सत का फुरसइत हालत का हालइत बरकत का बरकइत
स्टार्ट का इस्टाट स्कूल का इस्कूल, स्टील का इसटिल
4. खोरठा शब्द के आरंभ में ’य‘ और ’व‘ का प्रयोग नहीं है। या यों कहे ‘य’ या व से प्रारंभ होनेवाले शब्द खोरठा के मूल शब्द भंडार में नहीं है। अन्य भाषा से आये शब्दों में ’य‘ तीन रूपों - ज, इअ, या ‘ए’ में बदल जाता है। वहीं ’व‘ , ’ब' या 'ओ' में परिवर्तित हो जाता है देखें -
जैसे: यश < जस, यज्ञ < जइग
यत्न < जतन, यदि < जदि /जोदि
युग