22/08/2026
"ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि"
ये सिर्फ एक कहावत नहीं है, ये हमारे पहाड़ का पूरा एक ज़माना है।
जिसने भी ये पहली बार कही होगी, वो जरूर अपनी धुंधली आँखों से अपनी खाली टोकरी को देख रहा होगा।
इसका शाब्दिक अर्थ क्या है?
इसे तोड़-तोड़ कर समझो, तभी इसका दर्द समझ आएगा।
खोलण: खोलना
गांठि: गांठ में बंधा हुआ पैसा। यानी तुम्हारी पूंजी, तुम्हारी बचत।
टेकण: सहारा, टेक लगाने के लिए कुछ।
जांठि: जांठ, या लकड़ी की छड़ी जिससे सहारा लेकर चल सकते है
तो पूरा अर्थ बना -
मेरे खोल में एक दाना तक नहीं है जिसे खोलूं, मेरी गांठ में एक पैसा नहीं है जिसे खोलूं, और तो और, मेरे पास टेक लगाने के लिए जांठ तक नहीं है। मतलब मैं बिल्कुल, पूरी तरह से खाली हाथ हूँ।
# # # ये कहावत बनी कैसे?
सोचो पुराने बैजनाथ, बागेश्वर के किसी गाँव का मंजर।
असोज का महीना है। नया अनाज घर में आना चाहिए था, पर इस बार ओले ने सारी फसल मार दी। घर की बूढ़ी अम्मा सुबह-सुबह भकार (खोल) खोलती है, तो अंदर धूल उड़ती है। वो अपनी धोती की गांठ टटोलती है, उसमें कुछ नहीं। पड़ोस में जाकर जांठ मांगने जाती है तो शर्म आती है, क्योंकि लौटाने के लिए उसके पास अपना अनाज ही नहीं है।
वो थक कर चूल्हे के पास बैठ जाती है और बस इतना कहती है - "ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि।"
इस एक लाइन में भूख भी है, गरीबी भी है, और पहाड़ी स्वाभिमान भी है। वो किसी से भीख नहीं मांग रही, बस अपनी हालत बता रही है।
हम इसे कब कहते हैं?
ये गाली नहीं है, ये शिकायत भी नहीं है। ये अपने आप को कोसने वाली हंसी है।
1. जब सब रास्ते बंद हो जाएं: जैसे आजकल नौजवान कहता है - "भाई नौकरी गई, जेब खाली, फोन में रिचार्ज तक नहीं, सच में ना खोलण हूं गांठि वाला हाल है।"
2. जब कोई मदद मांगने आए और तुम सच में लाचार हो: कोई कहे "यार 500 रुपये उधार दे दे" और तुम कहो - "यार मेरा खुद ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि वाला हिसाब है इस महीने।"
3. किस्मत पर हंसने के लिए: पहाड़ी लोग रोते नहीं, बात को कहावत में लपेट कर हंस देते हैं।
इसमें पहाड़ का दर्शन छुपा है
मैदानी कहावतें कहती हैं "जेब खाली है"। बस। खत्म।
हमारी कहावत दो चीजों की बात करती है - खोलण और जांठि। एक खाने से जुड़ी, दूसरी काम से जुड़ी।
मतलब पहाड़ी के लिए गरीबी सिर्फ पैसे की कमी नहीं है। गरीबी है - जब तुम्हारे पास खाने को दाना न हो और काम करने का साधन भी न हो। जब तुम न खा सकते हो, न कमा सकते हो। ये दोहरी मार है।
इसीलिए ये कहावत इतनी गहरी लगती है। ये पेट की भूख और हाथ की लाचारी, दोनों को एक साथ कह देती है।
आज के ज़माने में इसका नया मतलब
आज खोलण हमारी फ्रिज है, अलमारी है।
गांठि हमारा PhonePe, Google Pay का बैलेंस है।
जांठि हमारी नौकरी, हमारी स्किल है।
जब फोन में 1% बैटरी, वॉलेट में 0 रुपये, और रिज्यूमे में कोई स्किल नहीं - तो समझो वही पुरानी बात है - ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि।
ये कहावत हमें याद दिलाती है कि हमारे दादा-दादी ने इससे भी बुरे दिन हंस कर काटे थे। तो हम भी काट लेंगे।