पहाड़ बल - Pahad ke log

पहाड़ बल  - Pahad ke log पहाड़ को feel ♥️ करो ⛰️🌄

22/08/2026

"ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि"

ये सिर्फ एक कहावत नहीं है, ये हमारे पहाड़ का पूरा एक ज़माना है।

जिसने भी ये पहली बार कही होगी, वो जरूर अपनी धुंधली आँखों से अपनी खाली टोकरी को देख रहा होगा।
इसका शाब्दिक अर्थ क्या है?
इसे तोड़-तोड़ कर समझो, तभी इसका दर्द समझ आएगा।

खोलण: खोलना

गांठि: गांठ में बंधा हुआ पैसा। यानी तुम्हारी पूंजी, तुम्हारी बचत।

टेकण: सहारा, टेक लगाने के लिए कुछ।

जांठि: जांठ, या लकड़ी की छड़ी जिससे सहारा लेकर चल सकते है

तो पूरा अर्थ बना -
मेरे खोल में एक दाना तक नहीं है जिसे खोलूं, मेरी गांठ में एक पैसा नहीं है जिसे खोलूं, और तो और, मेरे पास टेक लगाने के लिए जांठ तक नहीं है। मतलब मैं बिल्कुल, पूरी तरह से खाली हाथ हूँ।
# # # ये कहावत बनी कैसे?

सोचो पुराने बैजनाथ, बागेश्वर के किसी गाँव का मंजर।

असोज का महीना है। नया अनाज घर में आना चाहिए था, पर इस बार ओले ने सारी फसल मार दी। घर की बूढ़ी अम्मा सुबह-सुबह भकार (खोल) खोलती है, तो अंदर धूल उड़ती है। वो अपनी धोती की गांठ टटोलती है, उसमें कुछ नहीं। पड़ोस में जाकर जांठ मांगने जाती है तो शर्म आती है, क्योंकि लौटाने के लिए उसके पास अपना अनाज ही नहीं है।

वो थक कर चूल्हे के पास बैठ जाती है और बस इतना कहती है - "ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि।"

इस एक लाइन में भूख भी है, गरीबी भी है, और पहाड़ी स्वाभिमान भी है। वो किसी से भीख नहीं मांग रही, बस अपनी हालत बता रही है।
हम इसे कब कहते हैं?
ये गाली नहीं है, ये शिकायत भी नहीं है। ये अपने आप को कोसने वाली हंसी है।

1. जब सब रास्ते बंद हो जाएं: जैसे आजकल नौजवान कहता है - "भाई नौकरी गई, जेब खाली, फोन में रिचार्ज तक नहीं, सच में ना खोलण हूं गांठि वाला हाल है।"

2. जब कोई मदद मांगने आए और तुम सच में लाचार हो: कोई कहे "यार 500 रुपये उधार दे दे" और तुम कहो - "यार मेरा खुद ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि वाला हिसाब है इस महीने।"

3. किस्मत पर हंसने के लिए: पहाड़ी लोग रोते नहीं, बात को कहावत में लपेट कर हंस देते हैं।
इसमें पहाड़ का दर्शन छुपा है
मैदानी कहावतें कहती हैं "जेब खाली है"। बस। खत्म।
हमारी कहावत दो चीजों की बात करती है - खोलण और जांठि। एक खाने से जुड़ी, दूसरी काम से जुड़ी।

मतलब पहाड़ी के लिए गरीबी सिर्फ पैसे की कमी नहीं है। गरीबी है - जब तुम्हारे पास खाने को दाना न हो और काम करने का साधन भी न हो। जब तुम न खा सकते हो, न कमा सकते हो। ये दोहरी मार है।

इसीलिए ये कहावत इतनी गहरी लगती है। ये पेट की भूख और हाथ की लाचारी, दोनों को एक साथ कह देती है।
आज के ज़माने में इसका नया मतलब
आज खोलण हमारी फ्रिज है, अलमारी है।
गांठि हमारा PhonePe, Google Pay का बैलेंस है।
जांठि हमारी नौकरी, हमारी स्किल है।

जब फोन में 1% बैटरी, वॉलेट में 0 रुपये, और रिज्यूमे में कोई स्किल नहीं - तो समझो वही पुरानी बात है - ना खोलण हूं गांठि, ना टेकण हूं जांठि।

ये कहावत हमें याद दिलाती है कि हमारे दादा-दादी ने इससे भी बुरे दिन हंस कर काटे थे। तो हम भी काट लेंगे।

22/08/2026

म्यर जस मम कैक लै नै, सांक्क मम एक लै नै..

हिंदी शाब्दिक अर्थ - मेरे जैसे मामा किसी के नहीं है पर सगा मामा एक भी नहीं है
अर्थ - जान-पहचान तो बहुतों से है, पर संकट के समय अपना कोई एक भी नहीं।

ये सिर्फ कहावत नहीं, पहाड़ के हर घर का सच है।

इसका असली मतलब क्या है?

हमारी दादी-नानी कहती थीं -
मेला-ठेला में, ब्याह-बारात में, हाट-बाजार में सब तुम्हें पहचानेंगे।
"अरे ये फलाने का छोरा है, अरे ये बैजनाथ वाली हेमा है।"
हाथ जोड़ेंगे, चाय पिलाएंगे, फेसबुक पर लाइक करेंगे।

लेकिन...

जिस दिन घर में बीमारी आएगी,
जिस दिन जेब खाली होगी,
जिस दिन मन टूटा होगा और रात भर नींद नहीं आएगी,
उस दिन फोन की लिस्ट में 500 नाम होंगे, पर दरवाजा खटखटाने वाला एक नहीं होगा।

इसी को कहते हैं - जस माम सब हैं, सांक माम कोई नहीं।

एक छोटी सी पहाड़ी कहानी सुनो -

एक बुढ़िया थी। उसके दो बेटे परदेश में। गाँव में सब उसे "ताई-ताई" कहते थे। हर किसी के काम में जाती थी, हर ब्याह में पूरियां बेलती थी।

एक दिन बरसात में उसकी छत टपकने लगी। उसने सोचा गाँव वालों से कहूँगी।

सुबह-सुबह वो हर घर गई।
किसी ने कहा - आज तो मेला है।
किसी ने कहा - मेरे भी मिस्त्री नहीं आ रहे।
किसी ने कहा - हाँ हाँ, कल देखते हैं।

शाम तक वो भीगती रही।

रात को उसका एक दूर का भतीजा, जिसे किसी ने बुलाया भी नहीं था, चुपचाप टिन की चादर लेकर आ गया।

तब बुढ़िया ने कहा था -
"म्यर जस माम कैक लै नै, सांक माम एक लै नै।"

आज के जमाने में ये कहावत और भी सच्ची है -
1. सोशल मीडिया वाला जस: Instagram पर 1000 followers, Facebook पर 3000 दोस्त। स्टोरी देखेंगे 400 लोग। पर जिस दिन आप सच में टूटे हुए हो और लिखोगे "मैं परेशान हूँ", तो 2-3 लोग ही पूछेंगे - क्या हुआ? 2. मतलब वाला जस: जब तक तुम्हारे पास नौकरी है, पैसा है, गाड़ी है, तब तक सब "अपने" हैं। जिस दिन नौकरी गई, उस दिन पता चलता है कौन अपना था और कौन सिर्फ जस-पहचान वाला। 3. पहाड़ वाला सांक: पहाड़ में तो ये और गहरा है। परदेश में रहने वाले पहाड़ी को ये सबसे ज्यादा समझ आता है। गाँव में सब पहचानते हैं, पर शहर में बुखार में पानी देने वाला कोई नहीं।
तो सीख क्या है?

इस कहावत ने हमें दो बातें सिखाई हैं -

पहली - भीड़ को परिवार मत समझो। जान-पहचान होना बड़ी बात नहीं है।

दूसरी - उस "एक" को संभाल कर रखो। जो सांक में खड़ा है। वो चाहे दोस्त हो, भाई हो, या पड़ोस की ताई हो। भीड़ में हजारों से अच्छा, संकट में साथ खड़ा एक ही काफी है।

आपके जीवन में वो "एक" कौन है?

जो बिना कहे समझ जाता है, बिना बुलाए आ जाता है?

हो सके तो आज उसे एक फोन कर लेना। क्योंकि यही तो असली कमाई है।

#कुमाऊनी #पहाड़ी_कहावत #उत्तराखंड #पहाड़_की_बात

22/08/2026

झक मार बेर झुंगर खै, साजि लै नै बासि खै...

ये सिर्फ एक कहावत नहीं है, ये हमारे पहाड़ का पूरा दर्शन है।

हमारे बुजुर्ग कहते थे, जब कुछ न हो तो जो है उसी में गुजारा करना सीखो।

इसका सीधा मतलब क्या है?
पहाड़ में झुंगर (साँवा-कोदो जैसा मोटा अनाज) गरीब का खाना माना जाता था। जब खेत में धान-गेहूं नहीं होता था, या बरसात ने सब खराब कर दिया, तो झक मार के मतलब मजबूरी में वही झुंगर खाना पड़ता था।

और "साजि लै नै बासि खै" - मतलब अगर ताजी रोटी नहीं है तो बासी से ही पेट भर लो, पर भूखे मत रहो, नखरे मत करो।

क्यों कही गई ये बात?
पहले पहाड़ में सुविधा नहीं थी। दुकान दूर, सड़क नहीं, पैसा नहीं। कभी-कभी महीनों तक एक ही अनाज खाना पड़ता था। तब हमारे दादा-दादी ने ये सिखाया कि समय जैसा भी हो, शिकायत मत करो, समझौता करना सीखो।

आज के जमाने में इसका अर्थ और भी गहरा है:

आज हमारे पास झुंगर नहीं, नौकरी की मजबूरी है। मनपसंद काम नहीं मिला तो जो मिला उसी को पकड़ना पड़ता है।
कभी शहर में ताजी हवा नहीं, सुकून नहीं, तो इसी भीड़-भाड़ में ही जीना पड़ता है।
कभी अपने लोग पास नहीं होते, तो फोन की आवाज से ही दिल को समझाना पड़ता है।

यही तो है पहाड़ी जिंदगी का सच - हम शिकायत नहीं करते, हम जीना जानते हैं।

हम पहाड़ियों ने हमेशा कम में ज्यादा खुश रहना सीखा है। तभी तो हम कहीं भी चले जाएं, गुजारा कर ही लेते हैं।

आपने भी कभी ऐसा समय देखा है जब आपको "झक मार बेर झुंगर" खाना पड़ा हो? अपनी कहानी कमेंट में जरूर बताना।

#पहाड़ी_कहावत #कुमाऊनी #उत्तराखंड #पहाड़ी_जीवन

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