22/10/2024
मैं किसान हूं।
मै किसान हूं पता नहीं गर्व करूं या शर्म करूं ।
खुद भूखा रह कर देश का पेट भरता हूं ,मन कहता है गर्व करूं ।
पर जो हालत मेरी है हालात कहते, शर्म करूं ।।
क्या बच्चों को मेरे रोटी कपड़े और स्कूल का हक नहीं।।
वैसे तो अन्नदाता नाम दिया मुझे , पर मेरे पास भरपेट अन्न तक नहीं ।।।
मैं ठंड में भी अड़ा रहा, मैं आंधियों में भी खेत पर खड़ा रहा ,
हालात मेरे बुरे हैं, पर मैं उनसे भी लड़ता रहा ।
खून पसीना एक कर दिया,
फसल पाली बच्चों की तरह,
हो गई एक झटके में नष्ट ,उसे देखकर में रोता रहा।।
कैसे चुकाऊं वो कर्ज, जो लिया था बेटी की शादी में ,
कैसे भरूं वो फीस, जो लगती है बेटे की पढ़ाई में ,
यही सोचकर मैं कभी फांसी,
तो कभी जहर खा मौत को गले लगाता रहा।। आयेंगे मेरे भी अच्छे दिन ,बैठा रहा इस आस में।
घर मेरा टपकता है,
फिर भी दुआ करता हूं ,कुछ तो बादल बरसे इस बरसात में।।
कुदरत ने कभी सूखा , तो कभी बाढ़ का खेल खेला है
अब तुम्हें क्या बताऊं , इस दिल ने क्या क्या जख्म झेला है।।