14/07/2026
मरुधरा की इस तपती हुई धरती पर, जहाँ दूर-दूर तक रेत ही रेत दिखाई देती है, वहाँ खेजड़ी का पेड़ किसी वरदान से कम नहीं। यह केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि अनगिनत जीवों की साँस, किसानों की उम्मीद और पशुपालकों का सबसे बड़ा सहारा है। जब खेत सूने हो जाते हैं, घास खत्म होने लगती है और धरती की हरियाली कहीं खो जाती है, तब यही खेजड़ी अपनी हर पत्ती से जीवन बाँटती है। आज भी गाँवों में यह परंपरा जीवित है। किसान बड़े प्रेम और समझदारी से खेजड़ी की कुछ टहनियाँ काटता है, ताकि नीचे खड़ी बकरियाँ और भेड़ें भरपेट चारा खा सकें। यह किसी पेड़ को नुकसान पहुँचाने की कहानी नहीं, बल्कि इंसान, पशु और प्रकृति के बीच सदियों पुराने विश्वास की कहानी है। खेजड़ी फिर से नई शाखाएँ निकाल लेती है, और हर साल उसी अपनापन के साथ जीवन देती रहती है। नीचे खड़ी ये मासूम बकरियाँ नहीं जानतीं कि उनके लिए कोई पेड़ अपनी शाखाएँ झुका रहा है। वे तो बस प्रकृति का दिया हुआ प्यार चुपचाप स्वीकार कर रही हैं। उनकी मासूमियत हमें सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी खुशी दिखावे में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर जीने में है। जिस धरती पर खेजड़ी खड़ी रहती है, वहाँ उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। यह पेड़ गर्मी में छाया देता है, सूखे में चारा देता है, मिट्टी को बचाता है और अनगिनत पक्षियों व जीवों का घर बनता है। इसलिए हमारे बुज़ुर्ग इसे केवल पेड़ नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य मानते थे।🐐🌿