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Kya a baat kitne% sahi hai
02/08/2026

Kya a baat kitne% sahi hai

😭😰😢समाजवादी पार्टी के 111 विधायक और 37 सांसद अगर सचमुच ठान लें, तो मोहम्मद आज़म ख़ान साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट जौहर यूनिवर...
18/07/2026

😭😰😢

समाजवादी पार्टी के 111 विधायक और 37 सांसद अगर सचमुच ठान लें, तो मोहम्मद आज़म ख़ान साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट जौहर यूनिवर्सिटी आज भी बचाया जा सकता है। सवाल सिर्फ़ संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।

मैं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जी से हाथ जोड़कर अपील करता हूँ कि अगर इतना मज़बूत विपक्ष होने के बावजूद भी जौहर यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए प्रभावी और निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी गई, तो यह संदेश जाएगा कि विपक्ष अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में असफल रहा। ऐसे में स्वाभाविक है कि मुस्लिम समाज और अन्य समर्थक भविष्य में नए राजनीतिक विकल्पों पर विचार करें।

जौहर यूनिवर्सिटी केवल ईंट और पत्थरों से बनी इमारत नहीं है। यह शिक्षा, संघर्ष और एक सपने का प्रतीक है। यदि किसी संस्थान पर संकट आता है, तो लोकतांत्रिक विपक्ष की ज़िम्मेदारी केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सड़क से लेकर सदन तक, अदालत से लेकर जनता के बीच तक, हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यम से आवाज़ उठाई जानी चाहिए।

अब समय केवल ट्वीट करने, प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने या बयान देने का नहीं है। एसी कमरों से बाहर निकलकर जनता के बीच खड़े होने का समय है। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो कठिन समय में संघर्ष करते हैं, न कि केवल प्रतिक्रिया देते हैं।

और रामपुर के माननीय सांसद कहाँ हैं? जो लोकतंत्र, संविधान और जनता की आवाज़ के लिए हर मंच पर संघर्ष की बातें करते थे, आज इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी सक्रियता क्यों दिखाई नहीं दे रही? रामपुर की जनता और पूरे प्रदेश को इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए।

यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि शिक्षा, लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का प्रश्न है। आज जो खामोश रहेगा, इतिहास उससे भी सवाल करेगा।

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13/07/2026

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आज से ठीक 159 साल पहले, आज ही के दिन ही, 30 मई 1866 को मौलाना क़ासिम नानौतवी के हाथों दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इस्लामिक ...
31/05/2026

आज से ठीक 159 साल पहले, आज ही के दिन ही, 30 मई 1866 को मौलाना क़ासिम नानौतवी के हाथों दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इस्लामिक यूनिवर्सिटी "दारुल उलूम" की बुनियाद सहारनपुर, देवबंद में रखी गयी थी। यह मिस्र और मदीना यूनिवर्सिटी के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इस्लामिक यूनिवर्सिटी है। यहां दुनिया भर से स्टूडेंट्स इस्लामिक तालीम के लिए आते है।

इस यूनिवर्सिटी के उलेमा-ए-कराम 1857 के इंकलाब में भी सक्रिय थे 10 मई 1857 को "शामली की जंग" में ब्रिटिश फौज के खिलाफ मौलाना इम्दादुल्लाह मुहाजिर मक्की और मौलान रशीद अहमद गंगोही के साथ मौलाना क़ासिम नानौतवी भी शामिल थे। हालांकि इस जंग में इंकलाबी सिपाहियों को काफी नुकसान पहुंचा था।

1857 एक ऐसा दौर था जिसमें कोई अपने मुल्क का मुस्तक़बिल अंग्रेजी और अंग्रेजों के साथ देख रहा था तो कोई अपनी विरासत और शकाफत को बचाने की जंग लड़ रहा था, एक तरफ सर सैय्यद अहमद खां थे जिन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजी ज़ुबान और मगरिबी तालीम से जोड़ने के लिये अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बुनियाद रखी तो वहीं दूसरी ओर मौलना क़ासिम नानोतवी थे जो अंग्रेजी ज़ुबान और अंग्रेजों के सख़्त खिलाफ थे उन्होंने इस्लामिक तहज़ीब को बचाने के लिये दारूल उलूम की बुनियाद रखी।

1857 के इंकलाब के नाकामयाब होने के बाद दारूल उलूम देवबंद के मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अनवर शाह कश्मीरी और मौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवी जैसे कई बड़े उलेमाओं ने 1919 में "जमीयत उलेमा ए हिन्द" की बुनियाद रखी और अंग्रेजों के खिलाफ बग़ावत जारी रखी। इस बग़ावत की वजह से हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उज़ैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित कई उलेमाओं को अग्रेजों ने जेल में डाल दिया था और कई उलेमाओं को मुल्क़ बदर कर दिया था।

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