18/07/2026
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समाजवादी पार्टी के 111 विधायक और 37 सांसद अगर सचमुच ठान लें, तो मोहम्मद आज़म ख़ान साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट जौहर यूनिवर्सिटी आज भी बचाया जा सकता है। सवाल सिर्फ़ संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।
मैं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जी से हाथ जोड़कर अपील करता हूँ कि अगर इतना मज़बूत विपक्ष होने के बावजूद भी जौहर यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए प्रभावी और निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी गई, तो यह संदेश जाएगा कि विपक्ष अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में असफल रहा। ऐसे में स्वाभाविक है कि मुस्लिम समाज और अन्य समर्थक भविष्य में नए राजनीतिक विकल्पों पर विचार करें।
जौहर यूनिवर्सिटी केवल ईंट और पत्थरों से बनी इमारत नहीं है। यह शिक्षा, संघर्ष और एक सपने का प्रतीक है। यदि किसी संस्थान पर संकट आता है, तो लोकतांत्रिक विपक्ष की ज़िम्मेदारी केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सड़क से लेकर सदन तक, अदालत से लेकर जनता के बीच तक, हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यम से आवाज़ उठाई जानी चाहिए।
अब समय केवल ट्वीट करने, प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने या बयान देने का नहीं है। एसी कमरों से बाहर निकलकर जनता के बीच खड़े होने का समय है। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो कठिन समय में संघर्ष करते हैं, न कि केवल प्रतिक्रिया देते हैं।
और रामपुर के माननीय सांसद कहाँ हैं? जो लोकतंत्र, संविधान और जनता की आवाज़ के लिए हर मंच पर संघर्ष की बातें करते थे, आज इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी सक्रियता क्यों दिखाई नहीं दे रही? रामपुर की जनता और पूरे प्रदेश को इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए।
यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि शिक्षा, लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का प्रश्न है। आज जो खामोश रहेगा, इतिहास उससे भी सवाल करेगा।