15/08/2026
यह गाथा है उस मिट्टी के लाल की, जिसकी रगों में बहते देशप्रेम के आगे अंग्रेजों का विशाल साम्राज्य भी कांप उठा था। बात है बिहार के तिरहुत-मिथिलांचल क्षेत्र की, जहाँ शिवहर-सीतामढ़ी की सरहद से सटी रघुनाथपुर ड्योढ़ी में 16 जनवरी 1906 को एक बालक ने जन्म लिया। पिता राजेंद्र प्रसाद मिश्र इलाके के नामी जमींदार थे। बालक का नाम रखा गया—रामनंदन मिश्र।
घर में धन-दौलत की कोई कमी न थी। काशी राजघराने तक में रिश्तेदारी थी। रामनंदन चाहते तो ऐशो-आराम की जिंदगी जीते, अंग्रेजों की बैरिस्ट्री की पढ़ाई करने लंदन चले जाते और जीवन भर सुख-सुविधाओं में गोते लगाते। लेकिन विधाता ने तो उनकी नियति में इतिहास के पन्नों पर अपनी शहादत और बहादुरी की अमर इबारत लिखना तय किया था।
जब जमींदार के बेटे ने क्रांति का रास्ता चुना
बात उन दिनों की है जब रामनंदन अपनी उच्च शिक्षा के लिए बनारस में थे। विदेश जाकर बैरिस्ट्री पढ़ने की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। उसी दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। गांधीजी के एक ही सवाल ने 19 साल के रामनंदन के मन को भीतर तक झकझोर दिया—"क्या तुम्हारा देश विदेश में बैठकर आजाद होगा?"
उसी क्षण रामनंदन ने विदेश जाने का इरादा हमेशा के लिए त्याग दिया। उन्होंने जमींदारी के रेशमी वस्त्र उतार फेंके और कंधे पर खादी का थान लादकर गांव-गांव घूमना शुरू कर दिया।
1926 में उन्होंने अपने ही घर में पर्दा-प्रथा, जातिवाद और जमींदारी शोषण के खिलाफ बगावत कर दी। पिता का विरोध झेलते हुए वे अपनी पत्नी राजकिशोरी देवी के साथ एक छोटी सी झोपड़ी में रहने लगे। जब अंग्रेजी हुकूमत ने गरीबों और किसानों का खून चूसना शुरू किया, तो रामनंदन मिश्र ने 1934 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) और रामवृक्ष बेनीपुरी के साथ मिलकर 'बिहार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना की और किसानों के सबसे बड़े रहनुमा बनकर उभरे।
जब अंग्रेजों के सर का दर्द बन गए रामनंदन
अंग्रेजी हुकूमत के लिए रामनंदन मिश्र एक नाम नहीं, बल्कि खौफ का दूसरा नाम बन चुके थे। वे जहाँ कदम रखते, हजारों-हजार युवा अंग्रेजों का तख्तापलट करने के लिए सिर पर कफन बांध लेते। ब्रिटिश पुलिस प्रशासन उनके नाम से थर-थर कांपता था।
1942 में जब महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का बिगुल फूंका, तो अंग्रेजों ने घबराकर रामनंदन मिश्र, जयप्रकाश नारायण और योगेंद्र शुक्ला जैसे शेर-दिल नेताओं को हजारीबाग सेंट्रल जेल की ऊंची और अभेद्य दीवारों के पीछे बंद कर दिया। अंग्रेजों को लगा कि अब क्रांति शांत हो जाएगी, पर वे गलत थे।
दीपावली की वो ऐतिहासिक और दुस्साहसिक रात
9 नवंबर 1942, दीपावली की पावन रात थी। पूरा देश दीयों की रोशनी में नहाया था और हजारीबाग जेल के संतरी भी जश्न में मशगूल थे।
जेल की 17 फीट ऊंची दीवार के नीचे घने अंधेरे में पंडित रामनंदन मिश्र और उनके साथियों की नजरें उस दीवार को नाप रही थीं। कैदियों की सूती धोतियों को आपस में जोड़कर एक मजबूत रस्सी बनाई गई।
पंडित रामनंदन मिश्र का फौलादी जिगर उस रात देखने लायक था। सबसे पहले वे खुद उस 17 फीट ऊंची दीवार पर चढ़े। अपनी जान की बाजी लगाते हुए ऊपर पहुंचकर उन्होंने एक-एक करके जयप्रकाश नारायण, योगेंद्र शुक्ला और अन्य साथियों को खींचकर दीवार के ऊपर चढ़ाया। फिर सबने छलांग लगाई और जेल के संतरी देखते रह गए! 'हजारीबाग जेल ब्रेक' की यह घटना ब्रिटिश साम्राज्य के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा थी।
'आजाद दस्ता' और अंग्रेजों की नाक में दम
जेल से भागने के बाद पंडित रामनंदन मिश्र रुके नहीं। वे नेपाल के तराई वाले घने जंगलों में चले गए और वहां 'आजाद दस्ता' नाम से एक गुप्त क्रांतिकारी सेना बनाई।
वे रात के सन्नाटे में नेपाल के जंगलों से निकलते, अंग्रेजों की रेल की पटरियां उखाड़ देते, पुलिस थानों पर धावा बोलते और ब्रिटिश खजाने को लूटकर गायब हो जाते। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें 'जिंदा या मुर्दा' पकड़ने के लिए भारी इनाम की घोषणा कर रखी थी, पर शिवहर का यह सपूत हर बार अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर निकल जाता।
उन्हें पंजाब में आंदोलन का नेतृत्व करते समय दोबारा गिरफ्तार किया गया, लेकिन अंग्रेजों का कोई भी जुल्म उनकी रूह को तोड़ नहीं सका। अंततः 1946 में वे जेल से रिहा हुए।
आजादी के बाद का महान त्याग
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। सत्ता और पदों की रेस शुरू हो गई, लेकिन शिवहर के इस महान विद्रोही ने दिखा दिया कि वे कुर्सी के भूखे नहीं थे। 1952 में उन्होंने राजनीति के तमाम बड़े पदों को ठुकरा दिया और अपना पूरा जीवन अध्यात्म, समाज सेवा और प्रभु जगन्नाथ की भक्ति में लीन कर दिया।
27 अगस्त 1989 को इस महान क्रांतिवीर ने अंतिम सांस ली।
पंडित रामनंदन मिश्र केवल शिवहर या बिहार के ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के उन महान सपूतों में से एक हैं, जिनकी वीरता, त्याग और जज्बे की गाथाएं आने वाली सदियों तक हर हिंदुस्तानी के दिल में देशभक्ति का अलख जगाती रहेंगी।