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09/05/2026
मैं केवल बिज़नेस की बात नहीं कर रहा।वो फेक कलेक्शन भी होते हैं।मैं उन फिल्मों की बात कर रहा हूँ जिनका वाकई क्रेज था और ज...
22/03/2026

मैं केवल बिज़नेस की बात नहीं कर रहा।
वो फेक कलेक्शन भी होते हैं।

मैं उन फिल्मों की बात कर रहा हूँ जिनका वाकई क्रेज था और जिनके आने के कई सालों तक उन फिल्मों की बात हुई। जिन्होंने तत्कालीन दौर की फिल्म मेकिंग पर प्रभाव डाल कर दशा और दिशा बदल दी थी फिल्म इंडस्ट्री की।

इनमें पहली दो फिल्में शोमैन राजकपूर की आवारा और श्री 420 थीं।

आज तक आप इन दो मूवीज के प्रभाव को आज भी महसूस कर सकते हैं बॉलीवुड फिल्म मेकिंग में।

उसके काफी सालों बाद आई राजेश खन्ना की आराधना मूवी का भी काफी क्रेज रहा।

अमिताभ बच्चन के उदय के पहले राजेश रोमांटिक फिल्मों का एक दौर ही चला था जिनमें से कई मूवीज में राजेश खन्ना हीरो थे।

अमिताभ बच्चनकी शोले और फिर दीवार मूवीज खूब चलीं
उसके बाद एंग्री यंग मैन हीरोज का क्रेज 1989 में सलमान खान की मैंने प्यार किया आने तक चला।

मैंने प्यार किया का कलेक्शन आपको नहीं बता पायेगा कि ये कितनी बड़ी हिट थी और इसने कैसे अचानक ही एक्शन फिल्में बनाते बॉलीवुड को रोमांटिक जोनर में कैसे घुसेड़ दिया।

आशिकी उतनी बड़ी हिट भी नहीं थी पर इसके गानों ने बॉलीवुड म्यूजिक इंडस्ट्री का ऐसा हुलिया बदला कि क्या ही बोलें।

शाहरुख खान की दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे ने निश्चित किया
कि रोमांटिक फिल्मों का ये दौर बरकरार रहे।
विदेश में बसे अमीर भारतीय लोगों को हीरो के रूप में दिखाना यहीं से शुरू हुआ।

2000 में ह्रितिक रोशन की कहो न प्यार है मेरी याद में आखिरी ऐसी फिल्म थी जिसका वाकई करेज दिखा था।

2000 से 2025 तक मुझे एक भी बॉलीवुड फिल्म ऐसी नही याद जिसका ऊपर लिखी फिल्मों जैसा रियल प्रभाव हो।
आप ऊपर लिखी फिल्मों में गदर और बॉर्डर की बात न होने की शिकायत कर सकते हैं पर उन फिल्मों ने सिर्फ अच्छा बिजनेस किया था, उससे ज्यादा प्रभाव तो घातक का था।

फिर 2025 में धुरंधर आई और ऐसी आई जिसने बॉलीवुड फिल्म निर्माण के सारे मानक बदलने के बावजूद और बेहद हिंसक होने के बावजूद अलग ही आग लगा डाली।

मेरी याद में सिर्फ मैंने प्यार किया फिल्म का इतना वास्तविक क्रेज रहा जितना इस वक्त धुरंधर का है।
सिनेमा हालों में लाइन लगी है।
हर व्यक्ति इसके बारे में चाहते न चाहते बात करने पर मजबूर है।

इस फिल्म ने अब तक आराम की नींद सो रहे बॉलीवुड को अचानक झकझोर के जगा दिया है।

पूर्व की सारी बड़ी फिल्मों से अलग धुरंधर की आप तारीफ करें या बुराई,पर धुरंधर की बात जरूर करेंगे।
और ये वाकई महत्वपूर्ण चीज है।

14/09/2024

अगर आपसे कोई पूछे कि लालजी पांडेय को जानते हैं तो शायद आपको अपने दिमाग में जोर डालना पड़े, लेकिन अगर कोई पूछे कि 'अंजान' को जानते हैं तो यकीनन आपने ये नाम जरूर सुना होगा.

कौन थे 'अंजान'?

लालजी पांडेय को लेकिन दुनिया इस नाम से जान नहीं पाई. दरअसल उनको उनके दोस्तों ने एक उपनाम दिया था 'अंजान' और इसी नाम ने उन्हें असली पहचान दे दी. कला से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा वह तो कॉमर्स के छात्र थे लेकिन, लेखनी इतनी सधी कि शब्द जो लिखे वह फिजाओं में गूंजने लगे.

सिंगर मुकेश ने खोजा था 'अंजान' को

सही मायने में जानें तो मुंबई की फिल्मी दुनिया को यह नायाब हीरा जो मिला वह गायक मुकेश की खोज था. मुकेश एक बार अपने कार्यक्रम के सिलसिले में बनारस आए थे और यहां उन्होंने किसी के आग्रह पर अंजान की लिखी कुछ पंक्तियां उनके मुंह से सुनी और फिर उन्हें कहा कि आपको तो फिल्मों के लिए गाने लिखना चाहिए.

अंजान जी जाना तो मुंबई चाहते थे क्योंकि बनारस की आबो-हवा वैसे भी उन्हें भा नहीं रही थी, ऊपर से अस्थमा की बीमारी उनकी सांसों को रोक रही थी. ऐसे में डॉक्टर उनको सलाह दे भी रहे थे कि आपको जिंदा रहना है तो यह शहर छोड़ दीजिए.

ऐसे में बीमार अंजान बनारस छोड़ मुंबई के लिए निकल गए. मुंबई ने भी अंजान को संभाला नहीं मायानगरी ने खूब दर-दर की ठोकरें खिलाई. कई रातें अंजान ने ट्रेनों में सोकर गुजारी क्योंकि उनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं थी. किसी अपार्टमेंट के नीचे बिस्तर डालकर सो जाते.

'अंजान' को कैसे मिला पहला ब्रेक?

अगर मेहनत की जा रही है तो सफलता देर से ही सही लेकिन मिलती जरूर है. साल था 1953 प्रेमनाथ उन दिनों 'प्रिज़नर ऑफ गोलकोण्डा' का निर्माण कर रहे थे. उस समय मुकेश साहब को अंजान की याद आई और उन्होंने उनकी मुलाकात प्रेमनाथ से करवा दी.

इसके बाद उन्होंने पहली बार बतौर गीतकार किसी फिल्म के लिए गाना लिखा. हालांकि फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही लेकिन अंजान को काम मिलता रहा, फिर भी वह नाम और दाम के लिए संघर्ष करते रहे. उनके संघर्षों में कोई कमी नहीं आई.

फिर साल 1963 में फिल्म आई 'गोदान' जिसके गीत अंजान ने लिखे थे. इसका एक गाना 'पिपरा के पतवा सरीखा डोले मनवा, कि जियरा में उठत हिलोर, हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा, जरत रहत दिन रैन' ने अंजान के नाम को पहचान दिला दी लेकिन बैंक बैलेंस तब भी वैसे का वैसा ही रहा.

जब अंजान के गीत को मिली रफी की आवाज

इसके बाद गुरुदत्त ने एक फिल्म बनाने की सोची 'बहारें फिर भी आएंगी' इसके गाने कैफी आजमी, शेवन रिजवी और अजीज कश्मीरी लिख रहे थे. इसी बीच गुरुदत्त की अचानक मौत हो गई और फिल्म का निर्माण रुक गया.

फिर उनके भाई आत्माराम ने इस फिल्म को पूरा करने का बीड़ा उठाया. फिल्म के दो गाने लिखने का काम अंजान को मिला. इसमें से एक गीत 'आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है' को रफी साहब ने गाया था. फिल्म रिलीज के साथ इस गाने ने हंगामा मचा दिया.

कैसे खुली अंजान की किस्मत?

फिर कल्याणजी- आनंदजी के साथ जी.पी. सिप्पी की फिल्म बन्धन (1970) के लिए अंजान ने गीत लिखे और असल मायने में अंजान की किस्मत यहीं से खुली. अंजान एक बात हमेशा कहते थे कि मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री भगोड़े आशिक को कभी नहीं संवारती वह तो सच्चे आशिक को चाहती है जो संघर्ष के समय भी उसे छोड़कर नहीं जाता.

वह हमेशा यह भी कहते थे कि यह इंडस्ट्री जन्नत है जहां हूरें मिलती हैं, पैसा मिलता है, शोहरत मिलती है लेकिन, जन्नत में जाने के लिए मरना पड़ता है और इसके लिए तैयार रहना चाहिए.

ये सुपरहिट गाने निकले अंजान की कलम से

अमिताभ बच्चन की आवाज में 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है' आपने सुना ही होगा. इस गाने को भी अंजान ने ही लिखा था. इसके अलावा, उन्होंने 'इ है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ', 'जिसका मुझे था इंतजार', 'जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों', 'कब के बिछड़े', 'डिस्को डांसर', 'यशोदा का नंदलाला' जैसे गाने भी लिखे.

'खाई के पान बनारस वाला', 'ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना', 'रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा', 'काहे पैसे पे इतना गुरूर करे है', 'लुक छिप लुक छिप जाओ न', 'आज रपट जाएं तो हमें ना उठइयो', 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा', 'इन्तहा हो गयी इंतजार की', 'तू पागल प्रेमी आवारा', 'गोरी हैं कलाइयां, तू लादे मुझे हरी हरी चूड़ियां', 'मानो तो मैं गंगा मां हूं', जैसे अनगिनत सुपरहिट गाने अंजान की कलम के ही मोती हैं.

300 से ज्यादा फिल्मों के 1500 से ज्यादा गानों को अपनी कलम से रंग देने वाले अंजान को अचानक लकवा मार गया और फिर वह 4-5 साल तक बिस्तर पर ही पड़े रहे. फिर 67 साल की उम्र में 13 सितंबर 1997 को उनका निधन हो गया. अंजान को कभी पुरस्कार और सम्मान नहीं मिला लेकिन, उन्हें इस बात की खुशी थी कि उन्होंने जीते जी अपने बेटे शीतला पांडे (समीर) की सफलता देख ली और उसे फिल्मफेयर पुरस्कार मिलने की खुशी महसूस कर पाए.

07/11/2022

#ज़िंदगी_का_गणित

08/10/2022

2022 का मेडिसिन/फिजियोलॉजी का नोबेल पुरस्कार डॉ. स्वांते पेबो को मिला है।
और इन्होंने खोजा क्या है?
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आज के समय विज्ञान मानता है कि आधुनिक मानव यानि होमो सेपियंस यानि हम लोग इस धरती पर सबसे पहले अफ्रीका में 300000 साल पहले दिखाई दिए थे। लेकिन हमसे पहले एक अन्य मानव प्रजाति अफ्रीका से बाहर विचरण कर रही थी। यह प्रजाति थी नियंडरथल मानवों की। नियंडरथल मानव 400000 लाख साल पहले धरती पर आये थे और यूरोप व एशिया के अधिकतर भूभाग में फैले हुए थे।

लगभग 70000 साल पहले आधुनिक मानवों ने अफ्रीका से एशिया की धरती पर कदम रखा था। आज से 30000 हजार साल पहले नियंडरथल मानव विलुप्त हो गए। तो इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 40000 साल तक होमो सेपियंस और नियंडरथल मानव एक साथ यूरोप और एशिया में विचरण कर रहे थे।

1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने मानव के जेनेटिक कोड को देखना शुरू किया। इसके लिए नए नए औजार और नई तकनीकें विकसित हो रही थी। डॉ स्वांते पेबो ने इन्हीं औजारों और तकनीकों की मदद से नियंडरथल मानव के जेनेटिक कोड का अध्ययन करने करने लगे। लेकिन ये तकनीकें नियंडरथल मानव के डीएनए को समझने के लिए कारगर सिद्ध नहीं हो रही थीं क्योंकि नियंडरथल का डीएनए पूर्ण अवस्था में मिलता ही नहीं था।

म्युनिख विश्वविद्यालय में काम करते हुए डॉ पेबो ने माईटोकॉन्डरिया (हमारी कोशिकाओं में मौजूद एक विशेष संरचना जिसे कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है) में मौजूद डीएनए का अध्ययन करने पर ध्यान केंद्रित किया। हालांकि माईटोकॉन्डरिया के डीएनए में कोशिका के डीएनए से कम जानकारी होती है लेकिन नियंडरथल के केस में यह कोशिका के डीएनए से ज्यादा अच्छी हालत में मिल रहा था इसलिए सफलता की संभावना ज्यादा हो गई थी।
अपनी नई तकनीक के द्वारा पेबो ने नियंडरथल मानव की एक 40000 हजार साल पुरानी हड्डी के माईटोकॉन्डरिया के डीएनए का सीक्वेन्स बनाने में सफलता हासिल कर ली। और यह पहला सबूत था जो यह बताता है कि आधुनिक मानव नियंडरथल से जेनेटिक तौर पर भिन्न है। यानि यह एक भिन्न प्रजाति है।
2010 में पेबो और उनकी टीम ने नियंडरथल का पहला जेनेटिक सीक्वेन्स छापा। पेबो की इस खोज ने हमें यह बताया कि आज से आठ लाख साल पहले हमारा यानि होमो सेपियंस और नियंडरथल मानव का एक कॉमन पूर्वज इस धरती पर था।

पेबो और उनकी टीम को आधुनिक मानव के डीएनए में नियंडरथल के डीएनए के अंश भी मिले जिससे यह पता चलता है आधुनिक मानव और नियंडरथल मानव के बीच में इंटरब्रीडिंग होती रही है।

लेकिन सिर्फ यही काफ़ी नहीं था। पेबो को दक्षिणी साइबेरिया की एक गुफा में 40000 साल पुरानी इंसानी ऊँगली की हड्डी मिली थी। जब पेबो ने इसकी डीएनए सीक्वेन्सिंग की तो उन्हें कुछ ऐसा मिला जोकि आज तक किसी को नहीं मिला था। इस हड्डी का डीएनए न तो नियंडरथल के डीएनए से मिलता था और न ही आधुनिक मानव के डीएनए से। यह मानव की एक सर्वथा नई प्रजाति थी। इस नई प्रजाति को डेनिसोवा नाम दिया गया क्योंकि जिस जगह यह हड्डी मिली थी उस जगह को डेनिसोवा ही कहा जाता है। डेनिसोवा और नियंडरथल लगभग 600000 साल पहले एक दूसरे से अलग हुए थे।
लेकिन अभी एक महत्वपूर्ण खोज और बाक़ी थी। दक्षिण पूर्व एशिया के लोगों में से 6% में डेनिसोवा मानव के डीएनए के अंश भी मिले हैं, जिससे पता चलता है कि इन दोनों समूहों के बीच भी सम्पर्क रहा होगा।

बहरहाल इन खोजों ने हमारे पूर्वजों के बारे में हमारी जानकारी को विकसित किया है। साथ ही इनसे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास को समझने में भी मदद मिली है।

तीस साल पहले शुरू हुई विज्ञान की इस नई शाखा ने अब फल देने शुरू किये हैं, उम्मीद है कि आगे भी मानव अपने ज्ञान का दायरा बढ़ाता रहेगा।

इसके अलावा एक और बात। डॉ स्वांते पेबो 1982 के फिजियोलॉजी/मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार विजेता सुनये बेर्गस्त्रोम के पुत्र हैं। सुनये बेर्गस्त्रोम को नोबेल पुरस्कार प्रोस्टाग्लैंडिन नामक एक बायोकेमिकल के ऊपर उनके काम के लिए मिला था।

#नोबेलपुरस्कार

05/10/2022

प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी।
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्री कृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं।

30/08/2022
30/07/2022

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