The Hindu voice

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02/06/2026

हाल ही मे गुड फ्राइडे निकला लेकिन इसकी कहानी जानना हिन्दुओ के लिए भी जरूरी है ताकि हमें ये आइडिया हो सके कि पश्चिमी देश राजनीति मे धर्म का प्रयोग कैसे करते है।

2200 साल पहले मिडिल ईस्ट मे यहूदियों के 12 कबीले थे, ये कई जगह अत्याचार सहकर आज के येरुशलम और उसके आसपास बसे थे। यहाँ इनका एक पवित्र मंदिर था और इन्हे आशा थी कि भगवान अपना कोई दूत कभी भेजेगा, ये कुछ वैसा है जैसे आप गौतम बुद्ध के बाद से भगवान विष्णु की प्रतीक्षा कर रहे है।

इन्ही मे एक कबीले मे ईसा मसीह का जन्म होता है, उस समय रोम साम्राज्य था और येरुशलम का हिस्सा रोमनो ने यहूदियों को स्वतंत्र प्रभार के लिए दे रखा था। यहूदियों के पवित्र मंदिर मे ईसा मसीह के यहूदी संस्कार पूरे हुए, बाद मे ईसा मसीह कई वर्षो के लिए गायब हो गए और फिर उनके द्वारा कई चमत्कारो की खबरें येरुशलम पहुंची।

ईसा मसीह येरुशलम भी आये, उन्होंने देखा कि उस मंदिर मे व्यापार हो रहा है। भारत और चीन से आये व्यापारी वहाँ घोड़े और ऊंट बाँधते है, उन्होंने इसका विरोध किया जिस वजह से यहूदी धर्मांध भड़क गए और उन्होंने ईसा मसीह को शत्रु घोषित किया। उसी दिन शाम को ईसा मसीह अपना अंतिम भोजन करते है, उनका एक शिष्य यहूदा उनसे धोखा करता है।

अगली सुबह ईसा मसीह गिरफ्तार कर लिए जाते है और उन्हें बेरहमी से सूली पर लटका दिया जाता है जिस वजह से गुड फ्राइडे मनाया जाता है। ईसा मसीह के वचन उनके कई शिष्य रोमन साम्राज्य मे प्रचारित करते है और कई दशकों बाद रोमन साम्राज्य ईसाई धर्म अपना लेता है। उसके भी कई सालो बाद रोमनो ने येरुशलम पर हमला किया और दुहाई दी की इन यहूदियों ने ईसा मसीह को मारा था।

अब ट्विस्ट ये है कि ऊपर जो ईसा मसीह वाली कहानी लिखी है वो उनके जाने के 70 साल बाद लिखी गयी, 70 साल? आपने 7 महीने पहले कोई फ़िल्म देखी हो उसकी स्क्रिप्ट लिखकर दिखा सकते है?


ऐसे मे बौद्धिक प्रश्न है कि क्या ईसा मसीह सच मे थे भी? रोमनो को येरुशलम पर अधिकार करना था क्या इसीलिए तो ईसा मसीह की कहानी नहीं बनी? ईसा मसीह पवित्र मंदिर को बचाना चाहते थे जबकि रोमनो ने उस मंदिर को तोड़ दिया था, ऐसा क्यों?

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हज़रत मुहम्मद के जीवन का लेखन उनकी मृत्यु के 200 वर्षो बाद तक पूरा हुआ। मै हिन्दुओ का तुष्टिकरण नहीं कर रहा लेकिन वाल्मीकि ने रामायण राम के जीवित रहते लिखी, वेदव्यास ने महाभारत कृष्ण के जीवित रहते लिखी, महाभारत का तो पाठन भी जनमेजय के शासन काल मे ही हो गया था।

लेकिन अब्राहम के मानने वालों के केस मे ऐसा नहीं है, हिन्दू विचार करें कि जिन मजहबो ने दुनिया को नफ़रत से रंग दिया है उनका तरीका क्या है? ये एक पात्र बनाते है और उसके अनुरूप आरोप प्रत्यारोप करके सत्ता का युद्ध लड़ते है। महाभारत मे तो अभिमन्यु और घटोतकच समेत कई योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।

उनके नाम आज भी इतिहास मे है लेकिन ईसाई और मुसलमानो के युद्ध मे कितने लोग कहाँ कहाँ मरे वो शायद ही किसी को याद हो, जबकि सत्ता किसे मिली वो जगजाहिर है। हो सकता है मेरा आंकलन भी गलत हो लेकिन जितना अब्राहमिक धर्मों को पढ़ा है कुछ ना कुछ अपूर्ण लगता है।

कृष्ण, महावीर, बुद्ध और नानक के बारे मे कैसे भी पढ़े कहानी पूरी है लेकिन ज़ब इब्राहिम, इस्माइल, जीजस और मुहम्मद को पढ़ते है तो ऐसा लगता है जैसे वो एक चैप्टर था और दूसरा भाग अधिक भयावह तथा रक्तरंजीत होगा। इसलिए गर्व कीजिए की आप हिन्दू है, आप एक ऐसी माटी से जुड़े है जहाँ ज्ञान की नदिया बही है ना कि खून की।

बाकि खुद को तैयार कीजिए क्योंकि ईरान युद्ध अंत नहीं है, अमेरिका यूरोप और मिडिल ईस्ट वाले ज़ब तक लड़ लड़ कर मर नहीं जाएंगे वे सुकून से नहीं बैठेंगे। कारण वही कि ये शत्रु होते नहीं है अपितु सत्ता के लिए काल्पनिक पात्र बनाकर लड़ाते है।

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02/06/2026

*यह सामान्य युद्ध नहीं, सभ्यताओं का संघर्ष है??*
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*आपको क्या लगता हैं अमेरिका वापस लौट जायेगा या अफगानिस्तान, सीरिया, आदि आतंकवादी का जैसे देशों का कमर तोड़ कर जैसे परेशान किया वैसे करके छोड़ देगा...?*

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*मुझे पूरा विश्वास है कि जो अमेरिका ने आरम्भ किया है उसे समाप्त किए बिना वापस नहीं जाएगा। यह कोई साधारण युद्ध नहीं है। यह सभ्यताओं का युद्ध है। इस युद्ध का अंत तबतक नहीं होना चाहिए जब तक ईरान की मुल्ला सरकार समाप्त नहीं हो जाती। इस युद्ध को अनिर्णीत छोड़कर यदि अमेरिका चला गया तो यह पश्चिमी सभ्यता , गल्फ देशों तथा अमेरिका और इजरायल के लिए सामूहिक आत्महत्या साबित होगा।*

*इतनी बर्बादी के पश्चात भी मुल्ला ईरान का घमंड और दृढ़ता बहुत चेतावनी देने वाली है। एक घायल सांप को तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक उसके फन को पूरी तरह कुचल न दिया जाए। घायल सांप कितना खतरनाक साबित हो सकता है यह बात अमेरिका अच्छी तरह जानता होगा , होगा क्या जानता है।*

*मुल्ला ईरान जितना अधिक संघर्ष कर रहा है उतना ही अधिक उसे कुचलना आवश्यक है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों को यह काम दशकों पहले कर देना चाहिए था। किंतु उन्होंने डील कर मुल्ला ईरान को 170 बिलियन डॉलर थमा दिए। जिसका उपयोग मुल्ला ईरान ने मिसाइल , ड्रोन , यूरेनियम संवर्धित करने में तथा हुती,हमास और हिजबुल्ला को मजबूत करने में खर्च किए।*

*मुल्ला ईरान सामान्य राष्ट्र नहीं है। कट्टरवादी धर्म शासित परमाणु हथियार सम्पन्न मुल्ला ईरान मानवीय सभ्यता के लिए एक निश्चित खतरा है। यह नॉर्थ कोरिया नहीं है कि परमाणु बनाकर चुपचाप बैठा रहेगा।*

*जिस दिन मुल्ला ईरान के पास परमाणु हथियार आए उस दिन उसे एक घंटा भी नहीं लगेगा और गल्फ देश तथा इजरायल पर वह इन हथियारों से हमला कर देगा।*

*मानव सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए यह एक आवश्यक युद्ध है और नेतृत्व परिवर्तन वैकल्पिक नहीं अपरिहार्य है।*

*जो लोग कहते हैं कि ईरान से हमारा हजारों साल पुराना सांस्कृतिक , व्यापारिक सम्बन्ध हैं वे यह जान लें कि वह ये ईरान नहीं है। बेहतर होगा कि वे लोग अपने भ्रम से बाहर आ जाएं।*

*हम सभी लोगों को इस युद्ध में बिना झिझके अमेरिका, इजरायल और गल्फ देशों का समर्थन करना चाहिए।*

31/05/2026

मोसाद क्या चीज है
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कोई भी जंग महज़ जज़्बात या इत्तेफाक से नहीं, बल्कि बरसों की स्ट्रेटेजिक तपस्या से जीती जाती है।
ईरान ने पिछले 30-40 सालों में अपनी पूरी ताकत मिसाइल प्रोग्राम पर झोंक रखी थी। आज ईरान के पास मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा मिसाइल जखीरा है। उनकी खैबर और फतह जैसी मिसाइलें सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि दशकों की उस खामोश तैयारी का नतीजा हैं, जिसने इजराइल जैसे मुल्क के डिफेंस सिस्टम आयरन डोम को भी चुनौती दे डाली है।
इधर इज़राइल अंदर ही अंदर वो काम कर रहा था जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।
आज हम बात करेंगे इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद की और उसकी द ग्रेटेस्ट न्यूक्लियर रॉबरी की।
साल 2018 इजराइल को शक था कि ईरान गुपचुप तरीके से परमाणु हथियार बना रहा है। मोसाद ने इसे साबित करने के लिए एक बेहद खतरनाक प्लान बनाया।
मोसाद के जासूसों ने पता लगाया कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम के सारे गुप्त दस्तावेज तेहरान के एक साधारण से दिखने वाले गोदाम में छिपा रखे हैं। बाहर से यह जगह ऐसी लगती थी जैसे वहां पुरानी फाइलें या कबाड़ हो, ताकि किसी भी विदेशी एजेंसी को शक न हो।
मोसाद ने ईरान के अंदर ही अपने एजेंटों का एक नेटवर्क तैयार किया था। इन एजेंटों ने कई महीनों तक उस गोदाम की रेकी की। उन्हें पता था अलार्म कब बजता है, गार्ड्स की शिफ्ट कब बदलती है, गोदाम की तिजोरियों को काटने के लिए कितनी गर्मी चाहिए होगी।
31 जनवरी, 2018
रात के वक्त, करीब 20-25 जासूस उस गोदाम में घुसे। उनके पास सिर्फ 6 घंटे और 29 मिनट का समय था, क्योंकि सुबह 7 बजे गार्ड्स ड्यूटी पर आने वाले थे।
उन्होंने हाई-टेक टॉर्च का इस्तेमाल किया जो 3,600 डिग्री से ज्यादा तापमान पैदा करती थीं ताकि लोहे की भारी तिजोरियों को काटा जा सके।
उन्होंने करीब 55,000 पेज और 163 सीडी चुरा लीं।
जैसे ही काम खत्म हुआ, वे सारा सामान लेकर ट्रक में निकले और ईरान की सीमा पार कर गए। जब तक ईरानी अधिकारियों को पता चला कि क्या हुआ है, मोसाद के एजेंट इजराइल पहुँच चुके थे।
इस चोरी का असली मकसद सिर्फ कागज चुराना नहीं था, बल्कि कूटनीति में इसका इस्तेमाल करना था।
इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने टीवी पर आकर उन फाइलों को दुनिया के सामने रखा और दावा किया कि ईरान झूठ बोल रहा है।
इस घटना के बाद ही अमेरिका ने ईरान के साथ हुई परमाणु डील से हाथ खींच लिए थे।
इजराइल और अमेरिका ने मिलकर एक डिजिटल जासूस Computer Virus बनाया था जिसे स्टक्सनेट कहा जाता है। यह दुनिया का पहला ऐसा वायरस था जिसने बिना किसी धमाके के ईरान के परमाणु प्लांट की मशीनों को खुद-ब-खुद खराब कर दिया था। यह भी ईरान के अंदर मौजूद किसी इनसाइडर यानी मोसाद की मदद से ही संभव हो पाया था, जिसने वो पेन-ड्राइव वहां के सिस्टम में लगाया था।
उस रात ऑपरेशन में शामिल एक भी इजराइली एजेंट पकड़ा नहीं गया। जब सुबह 7 बजे ईरानी गार्ड्स गोदाम पहुँचे, तब तक मोसाद के एजेंट ईरान की सीमा पार कर चुके थे।
ईरान के लिए यह एक बहुत बड़ी बेइज्जती थी। उन्होंने इसे कवर करने के लिए और जासूसों को पकड़ने के लिए कई कदम उठाए लेकिन इजराइल ने एक साथ कई ट्रक अलग-अलग रास्तों पर भेजे ताकि ईरान की पुलिस और रडार भ्रमित हो जाएं कि असली दस्तावेज किस ट्रक में हैं।
माना जाता है कि वे सड़क मार्ग से पड़ोसी देश संभवतः अजरबैजान की सीमा पार कर गए थे, जहाँ से उन्हें प्राइवेट प्लेन के जरिए इजराइल ले जाया गया।
इजराइल ने इस चोरी से पहले एक फर्जी गोदाम बनाकर महीनों तक सेफ तोड़ने की प्रैक्टिस की थी, ताकि एक मिनट भी बर्बाद न हो।
मोसाद को दुनिया की सबसे घातक खुफिया एजेंसियों में यूँ ही नहीं गिना जाता है।
इसकी ताकत के पीछे तीन मुख्य इकाइयाँ हैं-
⚫ किदोन (Kidon):
यह मोसाद की सबसे गुप्त यूनिट है, जिसका काम सिर्फ टारगेटेड किलिंग और ऊंचे दर्जे की जासूसी है। वे दुश्मन देश के अंदर घुसकर बिना किसी को भनक लगे काम तमाम कर देते हैं।
⚫ कात्सा (Katsa):
ये उनके केस ऑफिसर्स होते हैं जो दूसरे देशों के नागरिकों को अपने लिए भर्ती करने में माहिर होते हैं।
⚫ सायनीम (Sayanim):
यह मोसाद का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है। ये वो आम यहूदी नागरिक होते हैं जो दुनिया भर में फैले हुए हैं और जरूरत पड़ने पर मोसाद को लॉजिस्टिक्स जैसे घर, कार या पहचान मुहैया कराते हैं, बिना यह जाने कि मिशन क्या है।
मोसाद कितना पॉवरफुल है ये भी देख लीजिये-
2020 में ईरान के सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की हत्या एक AI-पावर्ड रिमोट कंट्रोल मशीन गन से की गई थी। गन ईरान में थी और उसे चलाने वाला जासूस हजारों मील दूर बैठा था वो गन सैटेलाइट से चलती थी। मिशन पूरा होने के बाद वह गन खुद-ब-खुद फट गई ताकि कोई सबूत न बचे।जैसा कि मैंने स्टक्सनेट वायरस के बारे में बताया,वे बिना गोली चलाए किसी देश का पावर ग्रिड या न्यूक्लियर प्लांट ठप कर सकते हैं।
1960 के दशक में उनके जासूस एली कोहेन ने सीरिया के रक्षा मंत्री का सलाहकार बनने तक का सफर तय कर लिया था।
2018 वाली चोरी में, एजेंटों के पास सिर्फ 389 मिनट थे। उन्होंने उन 55,000 कागजों को ट्रक में ऐसे भरा जैसे कोई रद्दी का सामान हो, ताकि बॉर्डर पर चेकिंग के दौरान किसी को शक न हो।
एक पुराने मिशन में मोसाद के एजेंटों ने ईरान में घुसने के लिए खुद को एक फिल्म क्रू बताया था। वे लोकेशन देखने के बहाने ईरान में घूमे और अपना काम करके निकल गए।
मोसाद के बारे में कहा जाता है कि वे कभी अपनी जीत का जश्न नहीं मनाते और अपनी हार को कभी स्वीकार नहीं करते। उनके लिए सबसे बड़ी कामयाबी वो है, जिसके बारे में दुनिया को कभी पता ही न चले। इनके एजेंट किसी होटल के वेटर से लेकर दुश्मन देश के बड़े सरकारी सलाहकार तक हो सकते हैं। वे बरसों तक एक आम नागरिक की तरह रहते हैं,और सही वक्त आने पर एक्टिव होते हैं।
मोसाद कभी अपने मिशन को अधूरा नहीं छोड़ता। चाहे वो 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में खिलाड़ियों की हत्या का बदला लेना हो, जिसे उन्होंने 20 साल तक दुनिया के अलग-अलग कोनों में जाकर पूरा किया, या ईरान के परमाणु कार्यक्रम को मिट्टी में मिलाना
ये है इजराइल की खतरनाक रणनीति
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टाइम्स ऑफ़ इजराइल की रिपोर्ट्स तकनीकी मदद और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध खुफिया जानकारी पर आधारित हैं

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31/05/2026

“अगर एक सच आपको अंदर तक हिला दे… तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?”

सोशल मीडिया पर एक बयान तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें राजनीतिक विश्लेषक आनंद रंगनाथन ने ऐसी बात कही है जिसने बहस को और तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों के हित में बने किसी भी एक्ट को खत्म करने की बात नहीं होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या वही अधिकार हिंदुओं को भी मिल रहे हैं?

उनका कहना है कि अगर अलग-अलग समुदायों के लिए अलग कानून बनाए जा सकते हैं, तो फिर हिंदुओं के लिए भी उसी तरह की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने सनातन आयोग, हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड और गुरुकुल एजुकेशन एक्ट जैसी मांगों की बात कही।

यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग दो हिस्सों में बंटे नजर आ रहे हैं। कुछ लोग इसे समानता की मांग बता रहे हैं, तो कुछ इसे पूरी तरह राजनीतिक और विवादित नजरिए से देख रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में सभी के लिए एक समान कानून होना चाहिए, या फिर अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यवस्था जारी रहनी चाहिए?

फैसला अब आपके हाथ में है… आप क्या सोचते हैं?

31/05/2026

आंख खोलकर पढ़िये,,,,

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी।
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे।
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा।
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले।
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ।
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई...
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा।
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे,
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी।
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था।
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें।
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'।
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी।
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे।
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड।
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है।
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड।
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं।
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े।
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे।
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं।
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये।
मैं क्यों कहूँ?
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है।

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके।

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े।

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे।

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके।

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे।
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

साभार,,,।।
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31/05/2026

🔥धर्म और मजहब ( संमप्रदाय ) में अन्तर!!!
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१.धर्म का आधार ईश्वर और मजहब का आधार मनुष्य है, धर्म उस ज्ञान का नाम है जिसे मनुष्यों और प्राणिमात्र के कल्याण के लिए परमात्मा ने आदि सृष्टि में प्रदान किया, मजहब वह है जिसे मनुष्यों ने समय समय पर अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए स्वीकार किया और पुन: स्वार्थ सिद्धि के लिए उसका विस्तार किया।।

२.धर्म ईश्वर प्रदत्त है इसलिए एक है इसमें हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी किसी के लिए भी भेद-भाव नहीं, इसके विपरित मत मतान्तर अनेक मनुष्यों के बनाये होने के कारण अनेक हैं और अपने अनुयायियों के लिये पक्षपात से भरे पडे हैं।

३.धर्म सबका साझा है क्योंकि ईश्वर की देंन है। मजहब अपना अपना है सबका समान नहीं।

४.धर्म सदा से है नित्य है इसलिए उसका नाश नहीं होता, मत मतान्तर नवीन हैं, मनुष्यों द्वारा बनाये हुए हैं, इसलिए उनका नाश अवश्यभावी है।

५.धर्म बुद्धि, तर्क और विज्ञान का उपासक है, धर्म से कोई इन्कार नहीं कर सकता। मजहब या मत बुद्धि, तर्क और विज्ञान का विरोधी है, इसका मानना न मानना इच्छा पर आधारित है, आवश्यक नहीं।

६.धर्म कर्मानुसार फल की प्राप्ति मानता है और पाप और पुण्य क्रेनों का फल अवश्य मिलता है ऐसा मानता है जिस से धरती पर पाप नहीं बढ़ता । मजहब या सम्प्रदाय सिफारिश और शफाइत पर अवलम्बित है। मजहब में जब तक पैग़म्बर या ईसा पुत्र , गुरू या कोई अवतार माना जाने वाला सिफारिश न करे, स्वर्ग का द्वार बन्द रहेगा, और सिफारिश होने पर पापी से पापी भी स्वर्ग में प्रवेश पायेगा।इस धारणा से पाप बढ़ रहे हैं।

७. धर्म ईश्वर से मनुष्यों का सीधा सम्बन्ध बताता है, वह आत्मा और परमात्मा के मध्य मे किसी पीर, पैगम्बर, गुरु, ऋषि, मुनि, अवतार आदि की आवश्यकता नहीं समझता। मजहब या सम्प्रदाय ईश्वर और मनुष्यों के बीच में अपने अपने एजन्टों को ला खडा करता है।

८. धर्म प्राणिमात्र के सुख के लिए है और मत मतान्तर या सम्प्रदाय केवल अपने अनुयायियों के सुख की जिम्मेदारी लेता है क्योंकि मजहब के मानने वाले मोमीन और शेष सब काफिर हैं ऐसा उनका दृष्टिकोण है। मजहब का आधार केवल ईमान (विश्वास) है। मजहब पर ईमान लाओ और सब प्रकार की मौज उडाओ। फिर कोई रोकने वाला नहीं।मज़हब पर विश्वास करो, बस बेडा पार है।

९. धर्म मनुष्य के पूर्ण जीवन का ध्येय बताता है और वर्णाश्रम प्रणाली द्वारा उसको उन्नत बनाता है परन्तु मजहब में ऐसा कोई उदेश्य नहीं वह केवल मनुष्यों को पशु की तरह बंध कर रहना सिखाता है।मज़हब में अकल का दख़ल वर्जित है।

१०. धर्म में सृष्टि के नियम के विरुद्ध कुछ नहीं। मजहब सृष्टि नियमों से विरुद्ध भरे पडे हैं जैसे-एक स्त्री पुरुष से सारी सृष्टि का बनना मानना, मुर्दों का जीवित हो जाना, कुवांरी के पेट से पैदा हो जाना, हनुमान का सूर्य को मुंह में डाल लेना, पत्थर पर मूसा के डण्डा मारने से सात चश्मों का बह निकलना, आदि।

११. धर्म स्त्री पुरुष को समान अधिकार देता है। मजहब स्त्रियों को नरक का द्वार, शैतान की रस्सियां, पापयोनि, दीन, हीन, नीच निर्जीव जिसमें आत्मा नहीं ऐसा बता कर के उनके अधिकारों का संहार करता है।

१२. धर्म में सत्य, सरलता, संतोष, स्नेह , सदाचार और ऊँचा चरित्र आवश्यक हैं, मजहब इन गुणों की उपेक्षा कर वाह्य चिन्हों को महत्व देता है यथा तिलक लगाना, स्लेब लगाना, दाढी केस रखना आदि।

अत: धर्म और मजहब को एक समझना भारी भूल है और यह धर्म-विरोध का बडा कारण है।

मजहब (सम्प्रदाय) मनुष्यता का दुश्मन है।
कहीं आप मजहबी/साम्प्रदायिक तो नहीं आत्म निरीक्षण करें ? मज़हब ने सारे विश्व को बाँट दिया शांति चाहते हो तो मज़हब के स्थान पर धर्म की स्थापना करनी होगी।

30/05/2026

पाकिस्तान पहुंचने से पहले जसकीरत आखिरी बार अपने परिवार की तस्वीर देखता है और उसे जला डालता है...

पाकिस्तान से बच कर भारत पहुंचने पर वो उसी परिवार से मिलने का मोह नही छोड़ पाता पर दूर से ही उन्हे देख लौट जाता है... वो बंद होता दरवाजा उसे याद दिलाते हैं कि उसकी जरूरत देश को है,उसका परिवार उसके बिना भी ठीक है..

फिर वो आखिरी अपनी चीज अपने देश के लिए अपने बच्चे और पत्नी की तस्वीर जलाता है ,क्योंकि उसने भी कहा होता है कि अब उसके अंदर कुछ नही बचा है,बस बचा है तो देश को बर्बाद करने वालों से बदला लेने की आग...

होते हैं ऐसे पागल लोग बार्डर पर,बार्डर पार,जाने कहां कहां... जिसके लिए परिवार,प्यार सबसे ऊपर उनका देश‌ होता है।


जिस दिन कोई भारतीय देश के लिए काम करने लगता है,उसका अपना कुछ नही होता ना प्यार, ना परिवार,ना खुद के लिए वक्त,ना खुद उसकी जान....

अगर ये बातें प्रोपेगंडा हैं तो प्रैक्टिकली कहूं तो ये जो बाते कह रहे हैं ,उनके लिए ये देश कुछ मायने नही रखता.... वो बस देश की संपदा को चूस रहे हैं और इसके बदले इस पूरे देश को अपनी जाहिलियत दिखा रहें और कुछ नही....

30/05/2026

चिन्तनीय विषय,🫢🫢🤭

किसी वजह से किसी के मन में यह
कुछ जरूरी बात आई तो लगा की
यह बाते सबके साथ शेयर करनी चाहिए।

वैसे भी हम भारत के लोगो के भूल जाने की अच्छी आदत कभी कभी अपने लिए ही घातक स्थिति में चली जाती हैं तो अगर याद आया है और वह प्रश्नों के साथ है तो उत्तर के लिए सबके पास जाते हैं और उत्तर ढूँढने में सहयोग सबका लेते हैं….!!!

👉 UP में सत्ता जाने के बाद अखिलेश यादव ने सैफई महोत्सव क्यों नहीं मनाया?

👉 BSP के सत्ता जाने के बाद मायावती को उनके जन्मदिन पर हीरे,मुकुट और कैश से क्यों नहीं तौला गया ?

👉 योगीजी के CM बनने के बाद UP में अतीक अहमद,आजम खान या मुख्तार अंसारी जैसा कोई ताकतवर क्रिमिनल आदमी क्यों नहीं उभरा ?

👉 मोदी जी की केन्द्र के सत्ता में आने के बाद पी. चिदंबरम अपने बंगले के बगीचे में 6 करोड़ रुपये की पत्तागोभी क्यों नहीं उगा पाए ? 🤔

👉 आजकल सुप्रिया सुले अपनी दस एकड़ ज़मीन पर 670 करोड़ रुपये की फसल क्यों नहीं उगा पातीं ?

👉 कांग्रेस के सत्ता खोने के बाद रॉबर्ट वाड्रा ने हरियाणा में कोई ज़मीन क्यों नहीं खरीदी ?

👉 कांग्रेस के सत्ता खोने के बाद मुंबई में हाजी मस्तान,करीम लाला या दाऊद इब्राहिम जैसा कोई दूसरा क्रिमिनल क्यों नहीं उभरा ?

👉 यस बैंक के मालिक राणा कपूर को 2.5 करोड़ में एक पेंटिंग बेचने के बाद, प्रियंका गांधी ने दूसरी पेंटिंग क्यों नहीं बेची ?

👉 ए.के. एंटनी की पत्नी ने सरकार को 28 करोड़ रुपये में एक पेंटिंग बेचने के बाद दूसरी पेंटिंग क्यों नहीं बनाई ?

👉 UPA के दस साल के राज (2004-14) के दौरान सोनिया गांधी अपनी "अनजान" बीमारी के इलाज के लिए हर छह महीने में रेगुलर एक "अनजान" देश जाती थीं
~ वह दिल्ली में रहती थीं,लेकिन उनकी फ्लाइट्स हमेशा केरल एयरपोर्ट से ही उड़ती थीं
~उनके सामान में हमेशा 4-5 बड़े बैग होते थे..
~किसी सिक्योरिटी चेक का सवाल ही नहीं उठता था क्योंकि वह उस समय भारत की "सुपर PM" थीं। 2014 में सत्ता बदलने के बाद सोनिया की 'अनजान' बीमारी अचानक कैसे ग़ायब हो गई ।

कुछ तो गड़बड़ है…!!!

आपको भी इस बारे में सोचना चाहिए, देश हित में अगर ऐसी बाते गंभीर लगे तो ,

जयतु भारतं●
जयश्रीराम●

30/05/2026

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फिल्म   जिन्हें “प्रोपोगंडा” लग रही हो, वे यह लिस्ट पढ़ लें… इसमें उन आतंकियों के नाम हैं जो भारत की मोस्ट वांटेड सूची म...
30/05/2026

फिल्म जिन्हें “प्रोपोगंडा” लग रही हो, वे यह लिस्ट पढ़ लें… इसमें उन आतंकियों के नाम हैं जो भारत की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल थे और किसी ना किसी अज्ञात धुरंधर ने ही इन्हें मार गिराया:

#लश्कर_ए_तैयबा से जुड़े आतंकी

1. अबू कताल उर्फ फैसल नदीम
- यह लश्कर का शीर्ष कमांडर और हाफिज सईद का करीबी था। इसे मार्च 2025 में झेलम जिले में मार गिराया गया।

2. रज़ौल्ला निजामनी उर्फ अबू सैफुल्लाह
- सिंध प्रांत में मई 2025 में मारा गया। यह 2006 में नागपुर में RSS मुख्यालय पर हुए हमले का मास्टरमाइंड था।

3. अदनान अहमद उर्फ हंजला अदनान
- दिसंबर 2023 में कराची में मारा गया। यह 2015 में उधमपुर में BSF काफिले पर हमले का मुख्य साजिशकर्ता था।

4. अकरम गाजी
- लश्कर का यह कमांडर नवंबर 2023 में खैबर पख्तूनख्वा में मारा गया।

5. रियाज अहमद उर्फ अबू कासिम
- राजौरी के ढांगरी हमले का मास्टरमाइंड, सितंबर 2023 में PoK की एक मस्जिद के अंदर मारा गया।

6. ज़ियाउर रहमान: कराची में
- सितंबर 2023 में बाइक सवार हमलावरों द्वारा मारा गया।

#जैश_ए_मोहम्मद से जुड़े आतंकी

7. शाहिद लतीफ
- 2016 के पठानकोट एयरबेस हमले का मास्टरमाइंड। इसे अक्टूबर 2023 में सियालकोट की एक मस्जिद में मार गिराया गया।

8. दाऊद मलिक
- मसूद अजहर का करीबी सहयोगी, अक्टूबर 2023 में उत्तरी वज़ीरिस्तान में मारा गया।

9. मौलाना रहीम उल्लाह तारिक
- नवंबर 2023 में कराची में अज्ञात हमलावरों की गोली का शिकार हुआ।

10. मिस्त्री ज़हूर इब्राहिम
- 1999 के IC-814 विमान अपहरण में शामिल था। इसे मार्च 2022 में कराची में मारा गया।

#खालिस्तानी_एवं_अन्य_आतंकी_संगठन

11. परमजीत सिंह पंजवड़
- खालिस्तान कमांडो फोर्स (KCF) का प्रमुख। इसे मई 2023 में लाहौर में मार गिराया गया।

12. बशीर अहमद पीर उर्फ इम्तियाज़ आलम
- #हिजबुल_मुजाहिद्दीन का टॉप कमांडर। फरवरी 2023 में रावलपिंडी में मारा गया।

13. सैयद खालिद रज़ा
- ्र_मुजाहिद्दीन का पूर्व कमांडर, फरवरी 2023 में कराची में अपने घर के बाहर मारा गया।

14. सैयद नूर शलोबार
- कश्मीर में आतंकियों की भर्ती करने वाला मुख्य चेहरा, मार्च 2023 में खैबर पख्तूनख्वा में मारा गया।

15. अब्दुल्ला शाह
- 2023 में PoK क्षेत्र में अज्ञात हमलावरों द्वारा मारे जाने की रिपोर्ट्स।

16. सज्जाद गुल
- 2023 में संदिग्ध परिस्थितियों में PoK में मारा गया; कश्मीर में हमलों से जुड़ा था।

17. बासित दार
- 2023 में पाकिस्तान में अज्ञात गोलीबारी में मारा गया, घाटी में कई हमलों से जुड़ा।

18. अशरफ खान
- कराची में अज्ञात हमलावरों द्वारा मारे जाने की खबरें आई थीं, पर विवरण सीमित है।

19. नसीर अहमद
- लाहौर, पाकिस्तान में संदिग्ध हमले में मारे गया।

20. इस वर्ष की बोहनी, जनवरी 2026 में #पाकिस्तानी_सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल इमरान दयाल की भी हत्या की खबर आई है, जिसे 2025 के पहलगाम हमले का ISI हैंडलर बताया जा रहा है।

21. #लश्कर_ए_तैयबा के शीर्ष कमांडर बिलाल आरिफ सलफी को मुरीदके स्थित संगठन के मुख्यालय 'मरकज तैयबा' में मारा गया।

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