17/04/2025
ऊपर वाले से डरो
भारत में चाहे उत्तर हो या दक्षिण , पूरब हो पश्चिम सरकारी नौकरी का अलग ही क्रेज है। खास तौर पर यूपी बिहार में तो चपरासी भी हो तो चलेगा। अक्सर जब लोग कभी लड़की की शादी करने जाते हैं तो लड़के के पोस्ट से मतलब नहीं रखते। जिस जगह पर लड़का नौकरी करता है ऊपरी कमाई कितनी है? इससे रखते हैं। इसलिए शायद एक सिपाही दस-बारह लाख तिलक मांगता है और एक शिक्षक को चार-पांच लाख के भी लाले पड़े रहते हैं। नौकरी करने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह तो वह नौकरी करने वाला ही जानता है। सरकारी नौकरी में काम करना आना ही जरूर नहीं है, कैसे अधिकारी को खुश रखना है, यह भी आना चाहिए। हमारे संस्थान में दो लोग थे एक विभूति सिंह यादव दूसरे रामचरित्र एक प्रयोगशाला सहायक दूसरे चौकीदार दोनों ही विपरीत गुणों से भरे थे। विभूति जहां कामचोर का दादा था, वही राम चरित्र काफी मेहनत व लगन से काम करने वाला। रामचरित्र को बोलने नहीं आता। विभूति सब की शिकायत कर लेता मगर सामने पढ़ते ही हाथ जोड़कर गिर-गिराने लगता।
अकसर कहा करता - मुझे काम ही करना होता तो सरकारी नौकरी क्यों करता , अपने घर पर खेती नहीं करता।
विभूति ये जानता था कि काम कैसे निकालना है? काम निकलते ही लात मार देता था। अगर उससे कोई काम कह दीजिए रोना धोना शुरू कर देगा। उसका प्रसिद्ध तकिया कलाम था -एगो विभूति का-का करिहे।
प्राचार्या थोड़ा कड़क थी लगभग हर कर्मचारी का वेतन काट चुकी थी पर विभूति ही एक ऐसा था जिसका एक दिन का भी वेतन नहीं कटा था। वो अकेले में मैडम का पैर भी पकड़ लेता था और सबके सामने उनको गाली भी देता था। आराम से पैर फैलाकर ऑफिस में सो जाता यहां तक कि उपप्राचार्य बैठे रहते उनके सामने ही पैर फैलाकर सोता। वो कूढ़ कर रह जाते। जब तब उनसे झगड़ कर प्राचार्या के पास पहुंच जाता और बोलता मैडम जी उपप्रचार्य को खूब सुनाया हूं।
एक बार परीक्षा प्रभारी विजयन सर ने उसको फोटोकॉपी करने की ड्यूटी लगा दिया। हर पांच मिनट में पेपर फंसा देता था और वही से परीक्षा प्रभारी को बुलाने लगता , तंग आकर परीक्षा प्रभारी ने कहा - जाओ यहां से हम खुद कर लेंगे।
बाहर आकर वह दांत निपोरने लगा । विभूति के उल्टे रामचरित्र खूब मन लगाकर काम करता । पूरे विद्यालय की साफ सफाई व गेट पर ड्यूटी भी पूरी मुस्तैदी से करता। बस उसकी कमी थी कि वह प्राचार्य से लेकर चौकीदार तक सबसे कुछ गलत होने पर अड़ जाता। इस चक्कर में प्राचार्या ने उसके दो-तीन महीने का वेतन काट लिया था।
एक दिन दोनों एक साथ खड़े थे तभी सामाजिक विषय शिक्षक संतोष कुमार रामचरित्र को समझाते हुए - रामचरित विभूति से कुछ सीखिए बिना काम किए भी मजे से जिंदगी चला रहे हैं और आप पूरा दिन खटने के बाद भी वेतन कटवा लेते हैं।
रामचरित्र - सर सब लोग एक जैसे हो जाएंगे तो धरती सुधर नहीं जाएगी।
तभी विभूति बीच में बोल पड़ता है - सर जी हम भी तो काम करते हैं ऐसे मत बोलिए
एक दिन रामचरित्र सुबह-सुबह साफ सफाई करके नहाने घर चला गया। प्राचार्या जब आयी तो उन्हें पेड़ के पत्ते गिरे मिले। उन्होंने विभूति से कहा - रामचरित्र को बुलाओ।
इधर उधर ढूंढने के बाद मैडम - इधर नहीं दिख रहा, इसी बीच रामचरित्र आ जाता है।
प्राचार्या - आज तुम ड्यूटी पर नहीं आए थे रास्ते में पत्ते गिरे हैं।
रामचरित्र - मैडम जी सुबह ही झाड़ू लगाकर गया हूं पतझड़ का समय है पत्ते तो गिर ही जाएंगे। आप संतोष सर से पूछ लीजिए वो सबसे पहले मिले थे।
प्राचार्या - रामचरित्र ज्यादा मत बोलो अनुशासनहीनता बहुत है तुममें।
रामचरित्र - मैडम जी ऊपर वाले से डरो मुझे सारे शिक्षक व बच्चों ने देखा है किसी से भी पूछ लीजिए।
प्राचार्या – मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं। ज्यादा मत बोलो नहीं तो आज का वेतन काट लूंगी।
रामचरित्र - मैडम जी हमें माफ कर दो, हम फिर से झाड़ू लगा दे रहे हैं। आप मेरा वेतन मत काटिए पहले ही दो महीने का वेतन काट रखी हैं।