Amit kumar

Amit kumar Bhart mata ki jy

हमारे धर्मशास्त्रों में पाँच ऐसी महान नारियों का वर्णन है, जिनका प्रातःकाल स्मरण मात्र ही बड़े-बड़े पापों का नाश कर देता...
14/05/2026

हमारे धर्मशास्त्रों में पाँच ऐसी महान नारियों का वर्णन है, जिनका प्रातःकाल स्मरण मात्र ही बड़े-बड़े पापों का नाश कर देता है और जीवन में सौभाग्य लाता है। ये हैं पंचकन्या।
प्रसिद्ध श्लोक:
अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा।
पंचकन्या: स्मरेन्नित्यं महापातकनाशिनी:॥

ये देवियाँ विवाहित होकर भी अपनी अतुलनीय पवित्रता, धैर्य और धर्मपरायणता के कारण "चिर कुमारी" मानी जाती हैं। आइए, जानते हैं इनका परिचय:

1. अहल्या: ऋषि गौतम की पत्नी और अद्भुत सौंदर्य की स्वामिनी। छल का शिकार होने पर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अंततः भगवान राम के चरणों के स्पर्श से पत्थर से पुनः नारी बनीं। वे पवित्रता की मूरत हैं।

2. द्रौपदी: महाभारत की मुख्य नायिका और पाँच पांडवों की पत्नी। अग्नि से जन्मी 'याज्ञसेनी' ने जीवन भर अन्याय का सामना किया, लेकिन उनका स्वाभिमान और भगवान कृष्ण पर अटूट विश्वास नारी शक्ति की मिसाल है।

3. कुंती: पांडवों की माता और त्याग की प्रतिमूर्ति। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अपने पुत्रों को धर्म की राह पर चलाने के लिए सदैव प्रेरित किया। वे ममता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक हैं।

4. तारा: वानरराज बाली की पत्नी। वे अत्यंत बुद्धिमती और दूरदर्शी थीं। उन्होंने हमेशा बाली को सही सलाह दी और उनकी मृत्यु के बाद भी अपने विवेक से राज्य का हित सोचा। वे बुद्धि और विवेक की देवी हैं।

5. मंदोदरी: रावण की पटरानी और एक महान शिवभक्त। लंका के अधर्म के वातावरण में रहकर भी उन्होंने हमेशा धर्म का पक्ष लिया और रावण को सीता माता को लौटाने की सलाह दी। वे सतीत्व और सद्गुणों की आदर्श हैं।
ये पंचकन्याएँ हमें सिखाती हैं कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और मर्यादा पर अडिग रहना ही सच्ची शक्ति है। इनका स्मरण हमारे जीवन में सुख, शांति और पवित्रता लाता है।

राजा विक्रम एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारकर लाते हैं। बेताल अपनी शर्त के अनुसार एक नई कहानी शुरू करता हैएक नगर में 'ध...
14/05/2026

राजा विक्रम एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारकर लाते हैं। बेताल अपनी शर्त के अनुसार एक नई कहानी शुरू करता है

एक नगर में 'धर्मध्वज' नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके पास 'सत्वशील' नाम का एक अत्यंत वफादार सेवक था। सत्वशील राजा के लिए अपना जीवन भी दांव पर लगाने को तैयार रहता था।
एक बार राज्य पर भारी विपत्ति आई। राज्य की कुलदेवी राजा के सपने में आईं और कहा, "राजन, यदि तुम अपने इकलौते पुत्र की बलि स्वयं अपने हाथों से दो, तभी यह राज्य और यहाँ की प्रजा महामारी से बच पाएगी।"
राजा धर्मध्वज गहरे संकट में पड़ गए। एक तरफ पुत्र मोह था और दूसरी तरफ प्रजा की रक्षा। सत्वशील को जब यह बात पता चली, तो उसने राजा से कहा, "महाराज, आप विचलित न हों। राजा का धर्म प्रजा की रक्षा है। यदि राज्य बचेगा, तो कई कुल बचेंगे।"
अगले दिन बलि की तैयारी हुई। राजा ने भारी मन से तलवार उठाई। जैसे ही वह वार करने वाले थे, सत्वशील ने आगे बढ़कर राजा का हाथ रोक दिया और कहा, "महाराज, आप रुकिए। यह पाप आपके हाथों न हो। मैं अपने प्राणों की आहुति देता हूँ ताकि देवी प्रसन्न हो जाएँ।" इतना कहकर सत्वशील ने स्वयं का गला काटकर अपना बलिदान दे दिया।
यह देखकर सत्वशील की पत्नी और उसका पुत्र, जो वहीं खड़े थे, उन्होंने भी वियोग में अपने प्राण त्याग दिए। अंत में, राजा ने जब यह देखा कि उसके एक कर्तव्य के कारण पूरा परिवार खत्म हो गया, तो उसने भी ग्लानि में आकर अपनी गर्दन पर तलवार रख ली। तभी कुलदेवी प्रकट हुईं और सबको जीवित कर दिया।

बेताल ने पूछा— "हे राजन! अब बताओ कि इस पूरी घटना में सबसे बड़ा त्यागी कौन था? राजा, सेवक सत्वशील, उसकी पत्नी या उसका पुत्र?"
राजा विक्रम ने बिना देर किए उत्तर दिया:

"बेताल, इस घटना में सबसे बड़ा त्यागी राजा धर्मध्वज ही था।"

बेताल ने टोका— "कैसे? सत्वशील ने तो बिना किसी स्वार्थ के अपना और अपने परिवार का बलिदान दे दिया था!"
विक्रम का तर्क:

"सत्वशील एक सेवक था, और स्वामी के लिए प्राण देना उसका कर्तव्य और स्वामिभक्ति थी। उसकी पत्नी और पुत्र ने मोहवश प्राण त्यागे। लेकिन राजा धर्मध्वज, जो स्वयं एक स्वामी था, उसने अपनी प्रजा (जो उसके अपने बच्चे नहीं थे) के लिए अपने सगे पुत्र की बलि देने का निर्णय लिया और अंत में अपनी सत्ता व जीवन का मोह छोड़कर खुद को समाप्त करने चला था। एक समर्थ व्यक्ति द्वारा निस्वार्थ भाव से किया गया त्याग ही सबसे महान होता है।"

उत्तर सुनते ही शर्त टूट गई और बेताल फिर से पेड़ की ओर उड़ गया।

जीवन में कई बार हमें 'भावुकता' और 'कर्तव्य' के बीच चुनाव करना पड़ता है। सही चुनाव वही है जो व्यापक हित में हो।

राजा विक्रम का बार-बार बेताल के पीछे जाना हमें 'निरंतरता' का पाठ पढ़ाता है।

🌸 उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनर्जीवित करने की अद्भुत कथा 🌸महाभारत में अर्जुन के जीवन से जुड़ी अनेक रहस्यमयी घटनाएँ मिलती ह...
12/05/2026

🌸 उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनर्जीवित करने की अद्भुत कथा 🌸
महाभारत में अर्जुन के जीवन से जुड़ी अनेक रहस्यमयी घटनाएँ मिलती हैं, लेकिन उनमें से एक अत्यंत भावुक और अद्भुत प्रसंग है — नागकन्या उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनः जीवित करना।
यह कथा प्रेम, श्राप, प्रायश्चित और पुनर्जन्म जैसे गहरे भावों से भरी हुई है। 🙏
🌿 अर्जुन का वनवास और उलूपी से भेंट
जब पांडव इंद्रप्रस्थ में रहते थे, तब एक नियम बनाया गया था कि यदि कोई भाई दूसरे भाई और द्रौपदी के एकांत में प्रवेश करेगा, तो उसे वनवास जाना होगा।
एक दिन एक ब्राह्मण सहायता के लिए अर्जुन के पास आया।
उसकी गायों को चोर ले गए थे। अर्जुन को अपने शस्त्र लेने पड़े, लेकिन वे उसी कक्ष में रखे थे जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी उपस्थित थे।
धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन वहाँ गए और बाद में स्वयं वनवास पर निकल पड़े। 🌿
यात्रा करते हुए वे गंगा नदी के तट पर पहुँचे।
वहाँ उन्होंने स्नान किया। उसी समय पाताल लोक की नागकन्या उलूपी ने उन्हें देखा।
उलूपी अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और मायावी शक्तियों वाली नाग राजकुमारी थीं। 🐍✨
वे अर्जुन के रूप, तेज और वीरता पर मोहित हो गईं।
🌊 उलूपी अर्जुन को पाताल लोक ले गई
उलूपी ने अपनी नाग शक्ति से अर्जुन को जल के भीतर खींच लिया और उन्हें पाताल लोक ले गईं।
अर्जुन आश्चर्यचकित रह गए।
तब उलूपी ने विनम्रता से कहा—
“हे पार्थ! मैं आपसे प्रेम करती हूँ।
कृपया मुझे स्वीकार करें।”
अर्जुन पहले संकोच में पड़े, क्योंकि वे वनवासी ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे।
लेकिन उलूपी ने समझाया कि उनका व्रत केवल द्रौपदी के संदर्भ में था, अन्य विवाहों पर नहीं।
अंततः अर्जुन ने उलूपी को स्वीकार किया। 🌸
कुछ समय बाद उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम इरावान रखा गया।
इरावान आगे चलकर कुरुक्षेत्र युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
⚔️ भीष्म पितामह का वध और श्राप
कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह को पराजित करना लगभग असंभव था।
वे इच्छामृत्यु वाले महान योद्धा थे।
श्रीकृष्ण की योजना से अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाण चलाए।
भीष्म शिखंडी पर अस्त्र नहीं उठाते थे, क्योंकि वे उन्हें स्त्री मानते थे।
अर्जुन के बाणों से भीष्म शरशय्या पर गिर पड़े। 🏹
हालाँकि यह धर्मयुद्ध की आवश्यकता थी, फिर भी भीष्म के दिव्य भाई — वसु — इससे अप्रसन्न हुए।
उन्होंने अर्जुन को श्राप दिया—
“जिस प्रकार तुमने छलपूर्वक भीष्म का वध किया है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने ही पुत्र के हाथों मृत्यु प्राप्त होगी।”
उलूपी को इस श्राप का ज्ञान था। 🌿
🐎 अश्वमेध यज्ञ और बभ्रुवाहन
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया।
उस यज्ञ के घोड़े की रक्षा का दायित्व अर्जुन को मिला।
घोड़ा अनेक राज्यों में घूमता हुआ मणिपुर पहुँचा।
मणिपुर वही राज्य था जहाँ अर्जुन ने पहले राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था।
चित्रांगदा और अर्जुन का पुत्र था — बभ्रुवाहन। 👑
जब बभ्रुवाहन को पता चला कि अर्जुन आए हैं, तो वे विनम्रता से उनका स्वागत करने पहुँचे।
लेकिन उलूपी वहाँ पहले से उपस्थित थीं।
वे जानती थीं कि अर्जुन को श्राप से मुक्त करने का समय आ चुका है।
⚡ उलूपी ने बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए प्रेरित किया
उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा—
“तुम क्षत्रिय हो।
यदि अश्वमेध का घोड़ा तुम्हारे राज्य में आया है, तो तुम्हारा धर्म है कि तुम युद्ध करो।”
बभ्रुवाहन पहले संकोच में थे, क्योंकि सामने उनके पिता थे।
लेकिन धर्म पालन के लिए उन्होंने युद्ध स्वीकार किया।
🏹 पिता और पुत्र का भयंकर युद्ध
इसके बाद अर्जुन और बभ्रुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ। ⚔️
दोनों महान धनुर्धर थे।
बाणों की वर्षा होने लगी।
धरती काँप उठी और आकाश युद्ध की गर्जना से भर गया।
अंततः बभ्रुवाहन ने एक दिव्य बाण चलाया, जो सीधे अर्जुन के हृदय में लगा।
अर्जुन भूमि पर गिर पड़े। 😢
उनका शरीर निश्चल हो गया।
😭 चित्रांगदा का विलाप
जब चित्रांगदा ने अर्जुन को मृत देखा, तो वे रोने लगीं।
बभ्रुवाहन भी अत्यंत दुखी हुए।
उन्होंने कहा—
“मैंने अज्ञानवश अपने ही पिता का वध कर दिया!”
पूरा वातावरण शोक से भर गया।
✨ उलूपी लाई दिव्य नागमणि
तब उलूपी आगे आईं।
उन्होंने बताया कि यह सब एक श्राप को समाप्त करने के लिए आवश्यक था।
इसके बाद वे पाताल लोक गईं और वहाँ से एक दिव्य नागमणि लेकर आईं। 🐍💎
वह मणि अत्यंत तेजस्वी थी।
उससे दिव्य प्रकाश निकल रहा था।
उलूपी ने वह नागमणि अर्जुन की छाती पर रख दी।
क्षणभर में चमत्कार हुआ— 🌟
अर्जुन के शरीर में फिर से प्राण लौट आए।
उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठे।
सभी अत्यंत प्रसन्न हो गए।
🌸 श्राप से मुक्ति
उलूपी ने अर्जुन को बताया—
“हे पार्थ! यह सब वसुओं के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए किया गया था।
अब आप उस दोष से मुक्त हो चुके हैं।”
अर्जुन ने उलूपी, चित्रांगदा और बभ्रुवाहन को प्रेमपूर्वक अपनाया।
इस प्रकार यह दुखद घटना अंततः मंगलमय बन गई। 🙏
✨ इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
🌿 1. कर्म का फल अवश्य मिलता है
महान योद्धा अर्जुन को भी अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ा।
🌿 2. श्राप भी कल्याणकारी हो सकता है
अर्जुन की मृत्यु वास्तव में उनके दोषों से मुक्ति का मार्ग बनी।
🌿 3. सच्चा प्रेम त्यागमय होता है
उलूपी ने अपने प्रिय अर्जुन के कल्याण के लिए कठिन निर्णय लिया।
🌿 4. धर्म पालन सर्वोपरि है
बभ्रुवाहन ने पुत्र धर्म से पहले क्षत्रिय धर्म निभाया।
🌸 अंत में यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की योजना मनुष्य की समझ से कहीं अधिक गहरी होती है।
जो घटना दुखद प्रतीत होती है, वही भविष्य में मुक्ति और कल्याण का कारण बन
सकती है।
#कृष्णा
🚩 जय श्री कृष्ण 🚩

यह कथा महाभारत के सबसे महान और मार्मिक प्रसंगों में से एक है — माता गंगा, राजा शांतनु और देवव्रत (भीष्म पितामह) की कथा। ...
11/05/2026

यह कथा महाभारत के सबसे महान और मार्मिक प्रसंगों में से एक है — माता गंगा, राजा शांतनु और देवव्रत (भीष्म पितामह) की कथा। इसमें प्रेम, वचन, त्याग और भाग्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
🌊 गंगा, शांतनु और भीष्म पितामह की सम्पूर्ण कथा
🌺 गंगा का दिव्य स्वरूप
माता गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतरित दिव्य देवी मानी जाती हैं। पुराणों के अनुसार वे भगवान ब्रह्मा की पुत्री थीं और देवताओं द्वारा पूजित थीं। उनका जल पापों को हरने वाला और आत्मा को पवित्र करने वाला माना गया है।
उधर हस्तिनापुर में राजा प्रतिप के पुत्र शांतनु राज्य करते थे। वे अत्यंत धर्मात्मा, तेजस्वी और प्रजा का पालन करने वाले महान राजा थे।
🌿 गंगा और शांतनु का प्रथम मिलन
एक दिन राजा शांतनु गंगा नदी के तट पर शिकार के लिए गए। वहाँ उन्होंने एक अनुपम सुन्दरी स्त्री को देखा। उसका रूप इतना अलौकिक था कि शांतनु उसे देखते ही मोहित हो गए। वह स्वयं देवी गंगा थीं।
राजा ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने कहा—
“मैं आपसे विवाह करूँगी, लेकिन आपको एक वचन देना होगा कि आप कभी भी मेरे किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। जिस दिन आपने मुझे रोका या प्रश्न किया, उसी दिन मैं आपको छोड़कर चली जाऊँगी।”
प्रेमवश शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली और दोनों का गंधर्व विवाह हुआ।
👶 सात पुत्रों का रहस्य
विवाह के बाद गंगा को एक-एक करके पुत्र उत्पन्न हुए। लेकिन हर बार जैसे ही पुत्र जन्म लेता, गंगा उसे लेकर गंगा नदी में प्रवाहित कर देतीं।
राजा शांतनु यह देखकर भीतर से टूट जाते, लेकिन वचन के कारण कुछ बोल नहीं पाते।
ऐसा सात बार हुआ। सातों बालकों को गंगा ने नदी में बहा दिया।
✨ आठवें पुत्र का जन्म
जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ और गंगा उसे भी नदी में बहाने चलीं, तब शांतनु स्वयं को रोक नहीं पाए। उन्होंने दुख और क्रोध में कहा—
“तुम कैसी माँ हो? अपने ही बच्चों को जल में डुबो देती हो! मैं अब यह अधर्म नहीं होने दूँगा।”
बस, यही वह क्षण था जब शांतनु का वचन टूट गया।
तब गंगा मुस्कुराईं और बोलीं—
“राजन, आज आपने मुझे रोक दिया, इसलिए अब मुझे आपको छोड़कर जाना होगा। लेकिन जाने से पहले मैं आपको सत्य बताती हूँ।”
🌌 आठ वसुओं का शाप
गंगा ने बताया कि ये आठों बालक वास्तव में स्वर्ग के आठ वसु थे।
एक बार वसुओं ने महर्षि वशिष्ठ की दिव्य कामधेनु गाय चुराने का अपराध किया था। क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दिया।
वसुओं ने क्षमा माँगी, तब ऋषि ने कहा—
सात वसु जन्म लेते ही शाप से मुक्त हो जाएँगे।
लेकिन जिसने चोरी का मुख्य विचार दिया था, उसे पृथ्वी पर लंबा जीवन बिताना होगा।
इसी कारण गंगा ने सात पुत्रों को जन्म लेते ही नदी में प्रवाहित कर उन्हें शाप से मुक्त कर दिया।
लेकिन आठवाँ पुत्र — जो मुख्य दोषी वसु था — उसे पृथ्वी पर रहना था। यही बालक आगे चलकर देवव्रत और फिर भीष्म कहलाया।
👑 गंगा का प्रस्थान
गंगा ने शांतनु से कहा—
“यह बालक असाधारण होगा। मैं इसका पालन-पोषण स्वयं करूँगी और समय आने पर इसे आपको सौंप दूँगी।”
यह कहकर गंगा बालक को लेकर चली गईं।
उन्होंने देवव्रत को ऋषियों और देवताओं के बीच शिक्षित किया।
उसे वेद, शास्त्र, राजनीति, युद्धकला, धनुर्विद्या और धर्म का अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ।
कहा जाता है कि भगवान परशुराम जैसे महान गुरु से भी उसने शस्त्रविद्या सीखी।
⚔️ देवव्रत का हस्तिनापुर आगमन
कई वर्षों बाद एक दिन राजा शांतनु गंगा तट पर गए। वहाँ उन्होंने एक तेजस्वी युवक को देखा जो अपने बाणों से गंगा की धारा रोक रहा था।
राजा आश्चर्यचकित रह गए।
तभी माता गंगा प्रकट हुईं और बोलीं—
“राजन, यह आपका पुत्र है — देवव्रत।”
गंगा ने पुत्र को शांतनु को सौंप दिया।
फिर उन्होंने कहा—
“अब मेरा कार्य पूर्ण हुआ। मुझे ब्रह्मलोक लौटना होगा।”
इसके बाद गंगा अंतर्धान हो गईं।
राजा शांतनु अपने पुत्र को लेकर हस्तिनापुर आए और देवव्रत को युवराज घोषित किया गया।
🛕 देवव्रत से भीष्म बनने की कथा
आगे चलकर राजा शांतनु को सत्यवती नामक कन्या से प्रेम हुआ। लेकिन सत्यवती के पिता चाहते थे कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बने।
पिता के सुख के लिए देवव्रत ने भयंकर प्रतिज्ञा ली—
वे कभी विवाह नहीं करेंगे।
जीवनभर ब्रह्मचारी रहेंगे।
हस्तिनापुर के सिंहासन पर कभी अधिकार नहीं करेंगे।
उनकी यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर थी कि देवताओं ने आकाश से कहा—
“यह पुरुष भीषण प्रतिज्ञा वाला है।”
तभी से देवव्रत “भीष्म” कहलाए।
🌸 भीष्म पितामह का महत्व
Bhishma महाभारत के सबसे पूजनीय पात्रों में से एक माने जाते हैं।
वे सत्य, धर्म, त्याग और वचनपालन के प्रतीक थे।
उन्होंने अपने जीवन में—
पिता के लिए राज्य त्यागा,
विवाह का सुख त्यागा,
और अंत तक हस्तिनापुर की रक्षा की।
महाभारत युद्ध में वे कौरवों की ओर से लड़े, लेकिन उनके हृदय में धर्म और कृष्ण के प्रति गहरी श्रद्धा थी।
🌊 इस कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है—
वचन का महत्व,
माता-पिता के प्रति समर्पण,
त्याग की महानता,
और भाग्य के रहस्य।
माता गंगा का पुत्र भीष्म केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि त्याग और धर्म की जीवित मूर्ति थे।
#कृष्णा

प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियाँ थीं— कद्रू और विनता। दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों को...
10/05/2026

प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियाँ थीं— कद्रू और विनता। दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों को वरदान माँगने को कहा।

कद्रू ने एक हजार प्रतापी नाग पुत्रों की इच्छा जताई।

विनता ने केवल दो पुत्र माँगे, लेकिन शर्त रखी कि वे कद्रू के हजार पुत्रों से अधिक बलशाली हों।
समय आने पर कद्रू ने १००० अंडे दिए और विनता ने २ अंडे दिए। कद्रू के अंडों से हजार नाग पैदा हुए, जिनमें शेषनाग और वासुकी प्रमुख थे।

कद्रू के पुत्र जन्म ले चुके थे, लेकिन विनता के अंडे अभी नहीं फूटे थे। अधीर होकर विनता ने अपना एक अंडा खुद ही फोड़ दिया। उस अंडे से 'अरुण' पैदा हुए, जिनका शरीर आधा विकसित था।
अरुण ने अपनी माँ को श्राप दिया कि— "जिस ईर्ष्या के कारण तुमने मुझे अधूरी अवस्था में बाहर निकाला, उसी के कारण तुम अपनी सौत (कद्रू) की दासी बनोगी। अब दूसरे अंडे को धैर्य से पालना, वही तुम्हें दासीत्व से मुक्त कराएगा।" (यही अरुण बाद में सूर्य देव के सारथी बने)।

एक दिन कद्रू और विनता ने समुद्र मंथन से निकले सफेद घोड़े 'उच्चैःश्रवा' को देखा।

विनता ने कहा कि यह पूरी तरह सफेद है।

कद्रू ने छल करते हुए कहा कि इसकी पूंछ काली है।
दोनों के बीच शर्त लगी कि जिसकी बात गलत होगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। कद्रू ने अपने नाग पुत्रों से कहा कि वे बाल के समान सूक्ष्म होकर घोड़े की पूंछ से लिपट जाएँ ताकि वह काली दिखे। जिन नागों ने ऐसा करने से मना किया, उन्हें कद्रू ने 'जनमेजय के सर्प यज्ञ' में जलने का श्राप दे दिया।
अगले दिन घोड़े की पूंछ काली दिखी और विनता शर्त हार गई। वह कद्रू की दासी बन गई।

कुछ समय बाद विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ। गरुड़ अत्यंत विशाल और शक्तिशाली थे। अपनी माँ को दासी के रूप में देख उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने नागों से पूछा कि मेरी माँ कैसे मुक्त हो सकती है?
नागों ने शर्त रखी— "यदि तुम स्वर्ग से अमृत लेकर आओ, तो हम तुम्हारी माँ को मुक्त कर देंगे।"
गरुड़ ने स्वर्ग पर आक्रमण किया, इंद्र सहित सभी देवताओं को परास्त किया और अमृत कलश ले आए। अमृत सौंपते ही विनता दासीत्व से मुक्त हो गई।

अमृत नागों को देने से पहले गरुड़ ने भगवान विष्णु से वरदान प्राप्त किया कि वे उनके वाहन बनेंगे और अमर रहेंगे। जब गरुड़ ने अमृत का कुश (घास) पर रखा, तो इंद्र ने चालाकी से उसे वापस उठा लिया। नाग केवल उस घास को चाट पाए, जिससे उनकी जीभ दो हिस्सों में बंट गई, लेकिन विनता हमेशा के लिए आजाद हो गई।

कद्रू की ईर्ष्या ने उनके ही पुत्रों के लिए श्राप का मार्ग प्रशस्त किया।

विनता की अधीरता ने उसके पहले पुत्र को अपंग बना दिया, जबकि धैर्य ने गरुड़ जैसा वीर पुत्र दिया।

एक बार युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से पूछा  कि हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है ? सो ...
09/05/2026

एक बार युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से पूछा कि हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है ? सो कृपा कर विस्तार से बताइए।

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।

इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।

जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा अर्द्ध प्रसूता गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।

यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।

इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।

एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।

दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।

हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वफ़ादारी और कृतज्ञता की एक अद्भुत कथा सुनाई थी। यह कहानी है एक धर्...
08/05/2026

महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वफ़ादारी और कृतज्ञता की एक अद्भुत कथा सुनाई थी। यह कहानी है एक धर्मात्मा तोते और देवराज इंद्र के संवाद की।

एक बार एक शिकारी का जहरीला तीर निशाना चूक कर एक हरे-भरे, विशाल वृक्ष में जा लगा। जहर के प्रभाव से वह पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा। उस पेड़ पर रहने वाले सभी पक्षी, जो कल तक उसके फलों का आनंद लेते थे, उसे मरता देख एक-एक कर छोड़ गए।
लेकिन, उस पेड़ के कोटर में रहने वाला एक बूढ़ा, धर्मात्मा तोता वहीं डटा रहा। दाना-पानी के अभाव में वह भी पेड़ के साथ-साथ सूखकर कांटा होता जा रहा था, पर उसने अपना घर नहीं छोड़ा।
यह बात देवराज इंद्र तक पहुंची। एक मरते हुए वृक्ष के लिए अपने प्राण त्यागने वाले इस तोते को देखने वे स्वयं धरती पर आए।

इंद्र ने तोते से कहा, "अरे भाई! यह पेड़ अब सूख चुका है। न इस पर पत्ते हैं, न फल। इसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में फलों से लदे अनेकों पेड़ हैं, सुंदर सरोवर हैं। तुम वहां क्यों नहीं चले जाते? यहां व्यर्थ प्राण क्यों दे रहे हो?"
तोते का मर्मस्पर्शी उत्तर:
तोते ने जो जवाब दिया, उसने देवराज को भी निरुत्तर कर दिया। वह बोला:
"देवराज! मैं इसी पेड़ पर जन्मा, इसी की गोद में पला-ब बढ़ा। इसके मीठे फल खाए और इसने मुझे अनेकों बार दुश्मनों से बचाया। जब इसके अच्छे दिन थे, मैंने इसके साथ सुख भोगे। आज जब इस पर बुरा वक्त आया है, तो मैं अपने स्वार्थ के लिए इसे कैसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुःख में उसका साथ छोड़ देना तो अधर्म है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी स्वार्थी सलाह क्यों दे रहे हैं?"

तोते की निस्वार्थ भक्ति और त्याग देखकर इंद्र प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "मांगो, क्या वर मांगते हो?"
तोते ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने कहा, "प्रभु, मेरे इस प्यारे आश्रयदाता वृक्ष को पहले की तरह हरा-भरा कर दीजिए।"
इंद्र ने अमृत वर्षा करके उस सूखे पेड़ को पुनर्जीवित कर दिया। पेड़ फिर से लहलहा उठा।

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे रिश्ते वही होते हैं जो बुरे वक्त में परखे जाते हैं। जिसने हमारे अच्छे समय में साथ दिया हो, उसका हाथ बुरे समय में कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जैसा कि भीष्म ने कहा- "किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही सच्ची धर्मनीति है।"
।। जय श्री कृष्णा ।।

भगवान वराह अवतार की यह कथा अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक है, जिसका विस्तार से वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कंध में म...
07/05/2026

भगवान वराह अवतार की यह कथा अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक है, जिसका विस्तार से वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कंध में मिलता है।
आइए इसे पूरी भावना और विस्तार के साथ समझते हैं—

🌊 1. सृष्टि पर संकट की शुरुआत
सतयुग में हिरण्याक्ष नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था। वह दिति और कश्यप ऋषि का पुत्र था, और उसका भाई हिरण्यकशिपु था।
हिरण्याक्ष ने कठोर तपस्या करके अपार शक्ति प्राप्त की। शक्ति मिलते ही उसमें घोर अहंकार आ गया। वह स्वयं को अजेय समझने लगा और देवताओं को युद्ध के लिए ललकारने लगा।
एक दिन अपने अहंकार में उसने सोचा— "अगर मैं पूरी सृष्टि को ही अस्त-व्यस्त कर दूँ, तो कौन मेरा सामना करेगा?"
इसी विचार से उसने पृथ्वी (भूदेवी) का अपहरण कर लिया और उसे ब्रह्मांडीय महासागर (रसातल) की गहराइयों में ले जाकर छिपा दिया।

परिणाम ...

सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया जीवन समाप्त होने लगा चारों ओर अंधकार और भय फैल गया देवता अत्यंत चिंतित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे।

🌊 2. वराह अवतार का अद्भुत प्रकट होना ब्रह्मा जी सृष्टि की रक्षा के लिए ध्यान में लीन हो गए। तभी एक चमत्कार हुआ—
उनकी नासिका से एक छोटा सा वराह (सूअर का शिशु) प्रकट हुआ।
शुरुआत में वह बहुत छोटा था, लेकिन देखते ही देखते—
वह आकाश को छूने लगा उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया उसकी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं
देवता आश्चर्यचकित हो गए और समझ गए— यह कोई साधारण जीव नहीं, स्वयं भगवान विष्णु का अवतार है।

🌊 3. महासागर में प्रवेश और पृथ्वी की खोज......
भगवान विष्णु के रूप में वराह देव ने विशाल गर्जना की और सीधे ब्रह्मांडीय महासागर में कूद पड़े। समुद्र की लहरें उफान मारने लगीं जलचर भयभीत हो उठे वराह देव गहराइयों में पृथ्वी को खोजने लगे अंततः उन्होंने रसातल में जाकर माता भूदेवी को ढूँढ लिया।

🌊 4. हिरण्याक्ष और वराह देव का भयंकर युद्ध.. ।।
जैसे ही वराह देव पृथ्वी को उठाने लगे, हिरण्याक्ष वहाँ आ पहुँचा।
वह क्रोधित होकर बोला— "कौन है जो मेरी शक्ति को चुनौती दे रहा है?"
इसके बाद शुरू हुआ एक महाभयंकर युद्ध—
गदा, त्रिशूल और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग हुआ समुद्र की गहराइयों में भीषण टकराव हुआ देवता ऊपर से इस युद्ध को देख रहे थे हिरण्याक्ष अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन भगवान के सामने उसकी शक्ति टिक न सकी।
अंत में—
वराह देव ने उसे परास्त कर दिया
उसके अहंकार का अंत हो गया

🌊 5. पृथ्वी का उद्धार (भूदेवी की रक्षा)
युद्ध समाप्त होने के बाद—
वराह देव ने पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाया धीरे-धीरे उसे महासागर से बाहर लाए फिर उसे उसके सही स्थान (कक्षा) में स्थापित कर दिया
उस समय का दृश्य अत्यंत दिव्य था।
पृथ्वी देवी ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया देवताओं ने पुष्प वर्षा की पूरे ब्रह्मांड में शांति और संतुलन लौट आया

🌊 6. इस कथा का गहरा संदेश
यह कथा केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें गहरे आध्यात्मिक अर्थ छिपे हैं—

🔹 1. अहंकार का विनाश
हिरण्याक्ष का अंत यह सिखाता है कि. अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, सत्य के सामने टिक नहीं सकता।
🔹 2. भगवान का संरक्षण
जब भी सृष्टि पर संकट आता है—. भगवान किसी न किसी रूप में रक्षा के लिए अवतरित होते हैं।
🔹 3. पृथ्वी का महत्व
भूदेवी का उद्धार हमें सिखाता है—. पृथ्वी केवल भूमि नहीं, बल्कि माता है।
🔹 4. धर्म की विजय
अंततः हमेशा—. धर्म की जीत और अधर्म का नाश होता है।

🌟 समापन
वराह अवतार की यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि— जब भी जीवन में अंधकार और संकट आए, ईश्वर किसी न किसी रूप में मार्ग दिखाने अवश्य आते हैं।

रामायण का अनसुना रहस्य : सीता माता और दिव्य खीर की कहानी :-इस कथा के अनुसार जब माता सीता का हरण हुआ और रावण ने उन्हें अश...
06/05/2026

रामायण का अनसुना रहस्य : सीता माता और दिव्य खीर की कहानी :-
इस कथा के अनुसार जब माता सीता का हरण हुआ और रावण ने उन्हें अशोक वाटिका में बंदी बना कर रखा तब ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। इस पर देवराज इंद्र ने उनकी प्रसन्नता का कारण पूछा। इस पर परमपिता ने कहा कि हे देवराज! रावण का सीता को हर कर लंका ले आना उसके विनाश का आरम्भ है। वे महान पतिव्रता अपने पति से बिछड़ने के कारण सदैव दुखी रहती है और उनके दर्शनों के लिए व्याकुल है। किन्तु लंकापुरी समुद्र के तट पर स्थित है इसी कारण श्री राम को उनका पता लगना कठिन है।
परमपिता ब्रह्मा आगे कहते हैं कि इस बात से चिंतित दुखी रहने के कारण सीता भोजन नहीं करती हैं और कृशकाय हो गयी हैं। ऐसी दशा में निःसंदेह वे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी जिससे हमारे उद्देश्य (रावण का अंत) में संदेव उत्पन्न हो जाएगा। इसलिए आप शीघ्र लंकापुरी जाएँ और सीता से मिलकर उन्हें ये उत्तम और दिव्य हविष्य प्रदान करें।
परमपिता की आज्ञा से देवराज इंद्र लंका पहुँचते हैं। उनके साथ निद्रा देवी भी रहती है। लंका पहुँचने के बाद इंद्रदेव निद्रा देवी से सभी राक्षसियों को मोहित करने को कहते हैं। तब निद्रा देवी वहां उपस्थित सभी राक्षसियों को निद्रा में डाल देती हैं। फिर इंद्रदेव माता सीता के पास पहुंचकर उन्हें अपना परिचय देते हैं और कहते हैं कि हे जनक किशोरी! आप धैर्य धारण करें। आपके उद्धार के लिए मैं श्री राम की सहायता करूँगा और वे सेनासहित समुद्र को पार करेंगे। मैंने ही अपनी माया से इन सभी राक्षसियों को मोहित किया है। मैं स्वयं यह हविष्यान्न लेकर आपके पास आया हूँ। यदि मेरे हाथ से इस हविष्य को आप ग्रहण करेंगी तो आपको सहस्त्रों वर्षों तक भूख और प्यास नहीं लगेगी।
देवराज इंद्र के ऐसा कहने पर माता सीता शंकाग्रस्त हो जाती हैं और उनसे कहती हैं कि वो कैसे विश्वास करे कि वे देवराज इंद्र ही हैं। वो उनसे कहती हैं कि यदि आप वास्तव में देवराज इंद्र ही हैं तो अपने शुभ लक्षणों को प्रकट करें। तब उनका संदेह दूर करने के लिए देवराज इंद्र आकाश में खड़े हो गए, उनकी पलके नहीं झपकती थी, उनके वस्त्रों पर धूल का स्पर्श नहीं होता था, उनके कंठ में जो पुष्पमाला थी उसके पुष्प मुरझाते नहीं थे।
उनके ऐसे दिव्य लक्षणों को देख कर माता सीता को उन पर विश्वास हो गया और उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे रोते हुए बोली कि आज बड़े सौभाग्य से लक्ष्मण सहित श्री राम का नाम मेरे कानों में पड़ा है। मेरे लिए जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ और मेरे पिता मिथिला नरेश जनक हैं, उसी रूप में मैं आज आपको देख रही हूँ। मेरे पति को आपका ही सहारा है। आपकी आज्ञा से आपने जो मुझे ये पायस (खीर) दिया है उसे मैं अवश्य खाउंगी क्यूंकि उसी में रघुकुल का भला है।
ये कहकर इंद्रदेव के हाथ से उस खीर को लेकर सबसे पहले उसे श्री राम और लक्ष्मण को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाई के साथ जीवित हैं तो यह हविष्य भक्तिभाव से उन दोनों के लिए समर्पित है। तत्पश्चात माता सीता ने स्वयं उस खीर को खाया। इससे उन्होंने भूख और प्यास से होने वाले सभी कष्टों को त्याग दिया। फिर देवराज इंद्र ने उन्हें श्री राम और लक्ष्मण के कुशलता का समाचार दिया और फिर वापस अपने लोक चले गए।
🙏 जय श्री राम 🙏

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