07/10/2024
https://youtu.be/oHORNGnm510
श्री दीपक कुंवर जी🙏
माँ #धौलागिरी #चण्डिका का दुर्लभ #ब्रह्मविद्या विधान
#अलौकिक_चण्डिका_शक्ति_परीक्षण_➡️
देखिये माँ चण्डिका को हाथ की हथेली एवं अस्त्र एवं बिना सहारे हथेली में स्थिर करना तथा दुर्लभ शक्ति संचरण और यही वास्तविक चण्डिका शक्ति परीक्षण होता है !
माँ चण्डिका की ब्रह्मविद्या ही उसका वास्तविक ब्रह्मशक्ति परीक्षण होता है और माँ चण्डिका ब्रह्मशक्ति को पूर्ण रूप से कैंसे जागृत किया जाता है आप सभी भक्तजन अवश्य दर्शन करें 🚩
#माँ_चण्डिका_बन्याथ_ऊषामठ #चण्डिका_बन्याथ_वर्ष_2018 ( #श्री_केदारनाथ_अष्टभैरवनाथ_भूमि_हिमालय_केदारखण्ड)
माँ चण्डिका की बन्याथ करवाने में ब्रह्मविद्या का अभिन्न योगदान है मात्र चण्डिका फर्श में ही पूर्ण चण्डिका शक्ति निहित नहीं रहती है बल्कि उस चण्डिका फर्श के माध्यम से चण्डिका की शक्ति को ब्रह्मस्वरूप में जागृत किया जाता है बिना चण्डिका ब्रह्मविद्या एवं सिद्ध ब्रह्मगुरु के बिना चण्डिका की पूर्ण शक्ति जागृत नहीं हो सकती इसलिए चण्डिका की शक्ति को जागृत एवं संचालित करने हेतु प्राचीन ब्रह्मविद्या का ज्ञान आवश्यक है बिना ब्रह्मविद्या एवं ब्रह्मगुरु के चण्डिका फर्श और ब्रह्म का कोई औचित्य नहीं रहता ! इसलिए बिना ब्रह्मविद्या के सिद्ध हुए ब्रह्म और चण्डिका फर्श पर शक्ति संचारित नहीं हो सकती और न उसपर कोई शक्ति होती है अतएव ब्रह्मविद्या द्वारा उचित विधान से जब चण्डिका ब्रह्म एवं फर्श को सिद्ध किया जाता तभी माँ की शक्ति जागृत होती है 🚩
वर्तमान में ये ब्रह्मविद्या हम राजवंशी कुंवरों में मेरे पास और कालीमठ कालीमाई के पुजारी आचार्य शुभम प्रसाद भट्ट जी के पास चमोली के सती ब्राह्मणों जिनमें ब्रह्मगुरु पं हरिबल्लभ सती जी के पास पं विशम्भर दत्त सती एवं अन्य सती ब्राह्मणों के पास और बीरों के डिमरी आचार्यों के पास भी सिद्ध ब्रह्मविद्या है और सिद्ध ब्रह्मविद्या का अर्थ होता है कि चण्डिका ब्रह्म को पूर्ण शक्ति के साथ अपनी हथेली , अस्त्र , मस्तक में धारण करना और बिना सहारे ब्रह्म को स्थिर करना और यही सिद्ध चण्डिका ब्रह्मशक्ति का परिचय है किन्तु वर्तमान समय की आधुनिकता की मार एवं संस्कृति क्षरण होने के प्रभाव से वास्तविक ब्रह्मविद्या मात्र कुछ ही गिने चुने विद्ववानों के पास शेष बची हुई है !
धौलागिरी चण्डिका की ब्रह्मशक्ति रुद्रगर्भिय प्रस्तर पट्टिका विधान वाली है और यह विधान के विषय में आपको कुछ जानकारी देते हैं ➡️
#रूद्रगर्भिय_प्रस्तरीय_पट्टिका :- यह रत्नपुष्पी एवं कस्तूरी समेत गुप्त जड़ियों द्वारा सिद्ध होती है जिसमें करीब 251 जड़यों के तत्वों की आवश्यकता होती है इसमें 21 जीवित जड़ियाँ की आवश्यकता होती है जिसमें पँचवीर , पंचपल्लव , पंचरत्न , गोलोचन , क्षीरकाकोली , जीवक , जीवंती , जया विजया पुष्प , गरुडपंजा आदि जड़ीबूटियों और इसमें षोडस कुंडलियाँ बदली जाती है तथा ब्रह्म डोली के केन्द्र में ्री_यन्त्र तथा ैरव_यन्त्र विराजमान रहता है यह सर्वाधिक शक्तिशाली ब्रह्म विधान में इसमें देवी चण्डिका का ब्रह्म स्वयं स्थिर हो जाता है इसमें भी ब्रह्मगुरु हाथ से ब्रह्म एर्यवालों के पास फेंकता है !
आखिर किसी भी चण्डिका का भ्रमण क्षेत्र कैसे निर्धारित होता है चलिए आपको बताते हैं ➡️
चण्डिका देवी की बन्याथ उसकी दंष्ट्रविभ्या अदृतज ब्रह्म त्रिज्या के अनुसार प्रति 12 वर्षों में एक बार या लगातार 12 वर्ष तक आयोजित होती है क्योंकि चण्डिका देवी की यात्रा या तो 12 वर्षों में एक बार 6 माह तक कराने या लगातार बारह वर्षों में प्रतिवर्ष 3 माह यात्रा करवाने का नियम होता है चण्डिका देवी की ब्रह्म विद्या अत्यंत गुप्त होती है जो कि गढ़वाली परम्परानुसार तत्व साबरी ,तन्त्र विद्या पर आधारित होती है इसमें जड़ी बूटियां एवं ब्रह्म त्रिज्या के अनुसार ब्रह्म डोली के भीतर जड़ी बूटियां जैंसे रत्नपुष्पी , हथजड़ी , अश्वमारक ,रुद्रवीर , लटकवीर ,एकांगवीर , आदि अन्य गुप्त जड़ियाँ एवं भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार की कलम से 64 गायत्री लिखी जाती है और अष्टसंस्कारों से शुद्ध किये हुए पारद को एक लोहे के खोल में(पारा लोहे से क्रिया नहीं करता) भरकर #ब्रह्मडोली के भीतर शक्तिमूर्ति के आसन के पार्श्व में रखते हैं ताकि देव शक्ति जागृत रहे एवं जीवित भौंरा एवं मधुमक्खी , मधु , कस्तूरी , गिरिसिन्दूर , शिलाजीत , ढाक के पुष्प , दारुहरिद्रा , एवं आक को सिद्ध करके देवी ब्रह्म के चतुष्कोण में रखा जाता है ताकि कोई भी ब्रह्मबाधा को देवी पार कर सके तथा देवी ब्रह्म डोली के भीतर मधु का प्रयोग तथा जीवित भ्रमर (भौंरा) भी रखा जाता है जिससे ब्रह्म डोली में निरन्तर शक्ति प्रवाह होता रहता है और यह भौंरा यात्रा के अंत तक जीवित अवस्था में रहना चाहिए !
ाँ_चण्डिका_का_निर्धारित_भ्रमण_क्षेत्र ➡
चण्डिका देवी का परिभ्रमण अपनी ब्रह्मत्रिज्या एवं उसके भीतर स्थित ब्रह्म कार्मुकाँश के आधार पर पूर्व दिशा से उत्तर और दक्षिण से पश्चिम दिशा में जितना भ्रमण परिकोश 678प्ररावक्रीय प्रभासिक क्षेत्र × 789वित्तानविक परिदेश को गुणा करने पर देवी की ब्रह्म कुण्डली के अदृतज त्रिज्या से जो 2355 रज्जु क्षेत्र के बराज्योतिषाचार्यबर भूमि प्राप्त होगी उस क्षेत्र का भ्रमण करती है और देवी की परावर्धिक ब्रह्म त्रिज्या में जितने प्रभास रत्नपुष्पी की रस्सी से बनाये जाएं उस ब्रह्म निशान का भ्रमण क्षेत्र उतना अधिक बढ़ जाता है !
यह दुर्लभ जानकारी कहीं से copy पेस्ट नहीं अपितु स्वयं मेरे द्वारा दी गयी है यदि कोई त्रुटि रह गई हो या विधान में कोई कमी हुई हो तो मात्र चण्डिका के ब्रह्मा ही इसे अपने सुझावों से सम्पादित कराने की कृपा करें !
जय जय माँ धौलागिरी चण्डिका
श्री दीपक कुंवर जी🙏माँ #धौलागिरी #चण्डिका का दुर्लभ #ब्रह्मविद्या विधान #अलौकिक_चण्डिका_शक्ति_परीक्षण_➡️देखिये म....