11/03/2026
"ये इंडिया है मेरी जान!" – न्याय की जीत या सिर्फ वक्त का फेर?: घरौंडा का वो शोर अब शांत हो चुका है। डॉक्टरों की स्ट्राइक खत्म हो गई, तालियां बज चुकी हैं और सस्पेंशन का आदेश फाइलों में दब गया है। लेकिन क्या वाकई न्याय हुआ है?
कड़वा सच जो हम सबको पता है:
आज जो सस्पेंड हुआ है, वो कुछ दिनों बाद किसी दूसरे थाने में 'महारथी' बनकर लौटेगा।
कैमरों की लाइटें बंद होते ही, वादे भी धुंधले पड़ जाते हैं! जनता की याददाश्त छोटी है, और सिस्टम का 'मैनेजमेंट' बहुत बड़ा!
'ये इंडिया है मेरी जान!' यहाँ शोर तो बहुत होता है, लेकिन बदलाव की उम्र बहुत कम होती है। क्या डॉ. प्रशांत चौहान के साथ जो हुआ, वो वाकई एक सबक बनेगा? या फिर कुछ समय बाद एक नया जिला, एक नया थाना और वही पुराना 'अहंकार' फिर से सिर उठाएगा?
एक पत्रकार के नाते मेरा काम सिर्फ खबर दिखाना नहीं, बल्कि उस ठंडी पड़ती राख को कुरेदना भी है। सस्पेंशन इंसाफ नहीं, सिर्फ एक 'ब्रेक' है। असली इंसाफ तब होगा जब वर्दी और पद की गरिमा लात-घूंसों से बड़ी होगी।
आप क्या सोचते हैं? क्या ये मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा या इस बार कुछ अलग होगा? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।