07/08/2026
एक छोटे से पहाड़ी गाँव में सोमेश नाम का एक मूर्तिकार रहता था। वह मिट्टी और पत्थरों से बेहद खूबसूरत मूर्तियाँ बनाता था। सोमेश की एक अजीब आदत थी—जब भी वह कोई नई मूर्ति बनाना शुरू करता, तो अपने पास दो खाली घड़े रख लेता था।एक घड़े पर उसने लिखा था "अमृत" और दूसरे पर लिखा था "विष"।जब सोमेश मूर्ति बनाते समय सकारात्मक सोचता, जैसे—"यह मूर्ति कितनी सुंदर बनेगी," "इसे देखकर लोग खुश होंगे," तो वह एक सफेद रंग का कंकड़ 'अमृत' वाले घड़े में डाल देता। इसके विपरीत, जब उसके मन में नकारात्मक विचार आते, जैसे—"अगर यह खराब हो गई तो?" "लोग मेरी कला की बुराई करेंगे तो?" तो वह एक काला कंकड़ 'विष' वाले घड़े में डाल देता।सालों तक यह सिलसिला चलता रहा। सोमेश बूढ़ा हो गया और उसने मूर्तियाँ बनाना बंद कर दिया। एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अपने जीवन भर की कमाई—उन विचारों के घड़ों को देखा जाए।जब उसने दोनों घड़ों को पलटा, तो वह हैरान रह गया। 'विष' वाला घड़ा काले पत्थरों से पूरा भरा हुआ था, जबकि 'अमृत' वाले घड़े में सफेद कंकड़ बहुत कम थे। सोमेश को तुरंत समझ आ गया कि उसके जीवन में जो उदासी, डर और अकेलापन था, वह उसकी अपनी ही सोच का नतीजा था। उसने अपनी कला का हुनर तो बहुत अच्छा संभाला, लेकिन अपने विचारों के कारखाने पर ध्यान नहीं दिया।सोमेश ने अपने आखिरी दिनों में गाँव के बच्चों को इकट्ठा किया और दोनों घड़े दिखाते हुए कहा, "हमारे विचार ही हमारे जीवन की असल मूर्तिकला हैं। हम हर पल अपने दिमाग में एक विचार रूपी कंकड़ डालते हैं। याद रखो, तुम जैसा सोचोगे, तुम्हारा जीवन वैसा ही रूप ले लेगा।"इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि विचार ही हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। अगर हम लगातार नकारात्मक सोचेंगे, तो हमारा पूरा जीवन डर और निराशा से भर जाएगा। इसलिए अपने दिमाग में हमेशा सकारात्मक और रचनात्मक विचारों को ही जगह दें।