18/10/2023
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भूमि माहिं परन्त।
कोई एक गुरु ज्ञानते, उबरे साधु सन्त ।।
माया तो जलते दीपक की लौ के समान है और मनुष्य उन पतंगों की तरह हैं, जो इसके मोह में उस पर मंडराते रहते हैं । इस प्रकार भ्रम में भ्रमित अज्ञानी मनुष्य इसके ऊपर पड़ते हैं। कोई विरला ही साधु-संत होगा, जो गुरु के सदुपदेश ज्ञान आचरण से इस माया के महा-मोह से उद्धार पाता है।
~ जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज