Shivendra

Shivendra जब मन अशांत हो और भीतर रिक्तता महसूस हो, तब अध्यात्म अनिवार्य हो जाता है।
Spirituality beyond religion — a journey towards inner peace, balance & truth.

🌼🌿 स्वतंत्र विचार नहीं, संत-विचार ही मुक्ति का पथ है। 🌿🌼परमाराध्य संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज का यह अत्यं...
19/07/2026

🌼🌿 स्वतंत्र विचार नहीं, संत-विचार ही मुक्ति का पथ है। 🌿🌼

परमाराध्य संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज का यह अत्यंत गूढ़ संदेश है कि जिसे लोग "स्वतंत्र विचार" कहते हैं, वह प्रायः मन, अहंकार और अपनी सीमित बुद्धि का अनुसरण होता है। ऐसी स्वतंत्रता वास्तव में स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मन के बंधनों की एक सूक्ष्म कैद है।

जिस बुद्धि को अभी रजोगुण, तमोगुण और अहंकार संचालित कर रहे हों, उसके विचार सत्य का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकते। सत्य वही है जो संतों के अनुभूत ज्ञान, शास्त्रसम्मत विवेक और साधना से प्रकाशित हो। इसलिए संतमत का आग्रह है—अपने मन के पीछे नहीं, संतों के सत्य-वचन के पीछे चलो।

महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज कहते हैं कि वास्तविक स्वतंत्रता तब मिलती है, जब मन अपनी चंचलता छोड़कर सत्य के अनुशासन में प्रवेश करता है। जो संत-वचनों के बंधन को स्वीकार कर लेता है, वही संसार के समस्त बंधनों से मुक्त होने की दिशा में अग्रसर होता है।

केवल पढ़ लेने या तर्क कर लेने से आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। संतवाणी का अध्ययन, सद्गुरु का मार्गदर्शन, सत्संग, सदाचार, नाम-स्मरण, ध्यान और निरंतर अभ्यास—यही साधक के जीवन को स्थिर, सात्त्विक और अंततः समाधि के योग्य बनाते हैं।

संतमत किसी व्यक्ति-विशेष का मत नहीं, बल्कि सभी संतों के अनुभूत सत्य का समन्वित स्वर है। इसलिए महर्षि मेँहीँ परमहंस जी ने सदैव प्रेरित किया कि कबीर, नानक, दादू, तुलसी, पलटू, दरिया, गुरु नानक तथा अन्य संतों की वाणियों का समन्वित अध्ययन करो। सत्य सीमित नहीं होता; वह अनेक महापुरुषों के अनुभवों में एक ही प्रकाश बनकर प्रकट होता है।

मन का अनुसरण बंधन है, संत का अनुसरण मुक्ति है। यही संतमत का सार है।

(प्रस्तुति: शिवेन्द्र कुमार मेहता)
🙏🌹जय गुरु महाराज🌹🙏

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🌼🌿 जीवन में कभी निराश मत होइए। चाहे कर्मों की रात्रि कितनी ही लंबी क्यों न हो, यदि दिशा सही है, यदि सद्गुरु का हाथ सिर प...
15/07/2026

🌼🌿 जीवन में कभी निराश मत होइए। चाहे कर्मों की रात्रि कितनी ही लंबी क्यों न हो, यदि दिशा सही है, यदि सद्गुरु का हाथ सिर पर है और साधना निरंतर है, तो आत्मजागरण का सूर्योदय निश्चित है।🙏

🌿OneTruth
-Shivendra Mehta

🙏🌹 जय गुरुदेव 🌹🙏

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🌼🌿 जीव, जीवात्मा, आत्मा और परमात्मा — क्या अंतर है? 🌿🌼आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि परमात्मा कहाँ है, ब...
12/07/2026

🌼🌿 जीव, जीवात्मा, आत्मा और परमात्मा — क्या अंतर है? 🌿🌼

आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि परमात्मा कहाँ है, बल्कि यह है कि मैं कौन हूँ?

जब तक इस प्रश्न का उत्तर अनुभव से नहीं मिलता, तब तक समस्त ज्ञान अधूरा है।

जीव कौन है?
जो स्वयं को शरीर, नाम, परिवार, जाति, पद, धन और संसार से जोड़कर देखता है, वही जीव है। उसकी पहचान बाहर की वस्तुओं पर आधारित है। उसका जीवन 'मेरा' और 'तेरा' के भ्रम में बीतता है।

जीवात्मा क्या है?
जब चेतन सत्ता मन, बुद्धि, अहंकार और कर्म-संस्कारों से आवृत्त होकर शरीर में कार्य करती है, तब उसे जीवात्मा कहा जाता है। वह जन्म-मरण, सुख-दुःख, पाप-पुण्य और कर्मफल का अनुभव करती है। बंधन उसका स्वभाव नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान अवस्था है।

आत्मा क्या है?
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और प्रकाशस्वरूप है। उसमें कोई विकार नहीं। वह साक्षी है, कर्ता नहीं; प्रकाश है, अंधकार नहीं; सत्य है, परिवर्तन नहीं।

परमात्मा क्या है?
परमात्मा अनन्त चेतना, अनन्त प्रकाश और समस्त आत्माओं का मूल स्रोत है। वही सबमें व्याप्त है, फिर भी सबसे परे है। उसी से सबका अस्तित्व है और उसी में सबका अंतिम विश्राम है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—

जीवात्मा अपने आत्मस्वरूप को कैसे प्राप्त करे?

न शरीर बदलने से...
न वस्त्र बदलने से...
न केवल शास्त्र पढ़ने से...

बल्कि जब मन निर्मल होता है, इन्द्रियाँ संयमित होती हैं, जीवन सदाचारमय बनता है, सद्गुरु का मार्गदर्शन मिलता है और साधक नाम तथा ध्यान के द्वारा भीतर की यात्रा करता है, तब अज्ञान का पर्दा हटने लगता है।

तब जीवात्मा नया कुछ नहीं बनती; वह केवल यह जान लेती है कि मैं कभी शरीर नहीं था, मैं शुद्ध चेतना हूँ।

संतमत का सार यही है कि संसार को छोड़ना नहीं, संसार के मोह को छोड़ना है; शरीर का त्याग नहीं, शरीराभिमान का त्याग करना है; बाहर नहीं, भीतर लौटना है।

जिस दिन जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, उसी दिन उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। फिर संसार बंधन नहीं रहता, साधना बन जाता है; कर्म बोझ नहीं रहते, पूजा बन जाते हैं; और जीवन केवल जीने के लिए नहीं, परमात्मा तक पहुँचने का सेतु बन जाता है।

दोहा:🌹
जीव भुलायो निज स्वरूप, मन माया के जाल।
गुरु-शब्द जागे चेतना, कटे भवों का जाल॥

जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा की ओर बढ़ता है; और जो स्वयं को भूल जाता है, वही संसार में भटकता रहता है।

🙏🌺 स्वयं को जानना ही समस्त साधना का प्रारम्भ है, और परमात्मा को प्राप्त करना उसका परम फल। 🌺🙏

🌿OneTruth
-Shivendra Mehta

🙏🌹 जय गुरुदेव 🌹🙏

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