25/08/2022
भारत के एक महान स्वतन्त्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर जिन्हें आज भुला दिया गया
मौलाना मोहम्मद अली जौहर 1878 में रामपुर में पैदा हुए. बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण पालन-पोषण और शिक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी मां को निभानी पड़ी. रिवायत के अनुसार, उर्दू और फ़ारसी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई. इसके बाद उन्होंने बरेली से हाईस्कूल किया. आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ गए और वहीं उन्होंने बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की.
बड़े भाई शौकत अली की तमन्ना थी कि मौलाना जौहर आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विसेज़) की परीक्षा पास करें, जिसके लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भेजा गया, लेकिन मौलाना वहां असफल रहे. लंदन से वापसी के बाद मौलाना चाहते थे कि वह अलीगढ़ में उस्ताद की हैसियत से अपनी सेवाएं दें, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. विवश होकर उन्हें रामपुर में उच्च शिक्षा अधिकारी के पद पर काम करना पड़ा. कुछ दिनों तक उन्होंने रियासत बड़ौदा में भी काम किया, लेकिन मौलाना को ख़ुदा ने किसी और काम के लिए पैदा किया था.
शुरू से ही उनकी ख्वाहिश थी कि वह पत्रकारिता को अपना पेशा चुनें और इसके द्वारा देश की सेवा करें. 1910 से उन्होंने कलकत्ता से एक अंग्रेज़ी अख़बार कामरेड निकालना शुरू किया. 1912 में जब अंग्रेज़ों ने दिल्ली को अपना केंद्र बना लिया तो मौलाना जौहर भी दिल्ली आ गए और यहां से उन्होंने 1914 से उर्दू दैनिक हमदर्द निकालना शुरू किया. ये दोनों अपने समय के मशहूर अख़बार थे, जिनका उदाहरण आज भी कम ही मिलता है.
तौहीद तो यह है कि ख़ुदा हश्र में कह दे
यह बंदा दो आलम से ख़फ़ा मेरे लिए है,
क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है
इस्लाम ज़िंदा होता है, हर कर्बला के बाद.
मौलाना की यह शायरी सिर्फ़ उन्हीं दिनों का नतीजा है, जब वह जेल में थे. ख़ाली समय में, जबकि उन पर हर तरह की पाबंदी लगी थी, लेकिन दिल और दिमाग़ पर भला कौन पाबंदी लगा सकता है. लिहाज़ा शायरी का यह ज़ख़ीरा आज हमारे सामने है. जेल से बाहर आने के बाद राजनीतिक हंगामों और पत्रकारिता की ज़िम्मेदारियों ने उन्हें कभी इसकी मोहलत नहीं दी कि वह पल भर के लिए भी शायरी कर लिया करें. साहित्यिक सरमाए के रूप में मौलाना के कुछ पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं, जो उन्होंने अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को लिखे. इनमें हमें उनकी साहित्यिक झलक देखने को मिल जाती है. ये पत्र उनके निजी जीवन को उजागर करते हैं.
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के राजनीतिक जीवन पर अगर नज़र डालें तो भारतीय इतिहास में उनका सबसे बड़ा कारनामा ख़िलाफ़त तहरीक है. यह वह तहरीक थी, जो तुर्की के मुसलमानों के समर्थन में शुरू की गई थी, लेकिन बाद में इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया.
यही वह प्लेटफार्म था, जहां से महात्मा गांधी ने अपनी राजनीतिक शुरुआत की. ख़िलाफ़त तहरीक ने हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध ला खड़ा किया. दोनों ही संप्रदायों ने बड़े जोश और जज़्बे के साथ अंग्रेज़ों के ख़िला़फ कड़े क़दम उठाने शुरू किए, ताकि भारत को आज़ाद कराया जा सके. इसके लिए मौलाना ने हर तरह की यातनाएं सहीं. वह मरते दम तक अंग्रेज़ों से इस बात के लिए लड़ते रहे ।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर एक जगह लिखते हैं-
ब्रिटिश हुकूमत ने हमें एक मर्तबा ये पैग़ाम दिया था कि "अगर तुम दोनों भाई मशरूत (शर्तों पर) आज़ादी चाहो तो हुकूमत तुम्हें रिहा करने के लिए तैयार है." लेकिन न मैंने इस रिहाई को क़ुबूल किया, न मेरे भाई शौक़त ने ऐसी रिहाई को गवारा किया जो आज़ादी को, सदाक़त को, और हक़ को बेचकर हासिल की जाए."
मौलाना लगातार जेल जाने की वजह से सेहत ख़राब हो गई। डायबिटीज के मरीज थे जेल में सही खाना न मिलने की वजह से बीमार पड़ गए। 1930 में जब जेल से बाहर निकले तो बहुत ही ज़्यादा बीमार थे उसके बावज़ूद देश की आज़ादी के लिए वो लंदन की गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने गए और अपने आखरी भाषण में कहा
"मेरे मुल्क को आज़ादी दो या मेरे कब्र के लिए मुझे दो गज जगह दे दो क्योंकि यहां मै अपने मुल्क की आज़ादी लेने आया हूं।"
उस वक़्त अंग्रेजों ने उनकी बात नही मानी और कुछ महीनो बाद ही लन्दन में 04 जनवरी, 1931..के दिन मौलाना जौहर अली साहब का इंतिकाल हो गया था......
यह काफ़िला फिलिस्तीन जेरुशलम में स्वतन्त्रता सेनानी मौलान मोहम्मद अली जौहर के जनाज़े का है जो उनके चाहने वाले उन्हें लन्दन से जेरुशलम ले गए और वही उन्हें सुपुर्द ए खाक़ किया। तब जेरुशलम इजराइल का हिस्सा नही था। जेरुशलम के मुफ़्ती अमीनुल हुस्सैनी ने मौलाना के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई।
वतन से मोहब्बत करने का ज़ज्बा हमने अपने बुज़ुर्गों से विरसे में पाया है। वो लोग अपने वतन से किस दरजे की मोहब्बत करते थे कि आज़ादी के हंसते हंसते फांसी पर झूल गए लेकिन अपने वतन से मोहब्बत का ज़ज्बा नहीं छोड़ा. उसके लिए जद्दोजहद करते रहे अँग्रेजों से लड़ते रहे.
1754 में अली वर्दी खान और 1757 में नवाब सेराजुद्दौला और 1783 से 1799 तक टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ जिस जंग की शुरुआत की थी
उसी को 1803 में शाह अब्दुल अजीज मोहद्दिस देहलवी र. ने आज़ादी की तहरीक को चलाया और उसी तहरीक के साये तले आजादी की जंग 1831 में उनके शागिर्दों ख़ास तौर पर सैय्यद अहमद शहीद रायबरेली ने लड़ी उसके बाद 1857 में इसी तहरीक के जरिए आजादी का दूसरा दौर शुरू हुआ जिसमें शुरू से आखिर तक मुसलमानों ने कायदाना किरदार अदा करने के साथ साथ देश वासियों को भी इस जंगे आजादी में अपने साथ शामिल रखा, और इस तरह 1754 में जिस तहरीक की शुरुआत हुई थी बिला आखिर उसी के नतीजे 1947 में ये मुल्क आजाद हुआ,
1754 से 1947 तक कुर्बानी की एक मुसलसल दास्तान है जिसे हमारे बुज़ुर्गों ने अपने लहू से रक़म किया है.
बस हमें ये एहद करना है कि हमें बुज़ुर्गों के लहू को रायगां नहीं जाने देना है. इस आज़ादी की बहरहाल हिफाज़त करनी है इस मुल्क को हमेशा अपने सीने में बसा कर रखना है.
यौम ए आज़ादी मुबारक
हिन्दुस्तान आबाद रहे!