Aish's Photography

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14/01/2023

यह पानी की बोतल, नाइक गुलाब सिंह (वीर चक्र मरणोपरांत, 13 कुमाऊं रेजिमेंट) की है। इसपर पड़े गोलियों के निशान शत्रु की फायरिंग का घनत्व बता रहे हैं जो युद्ध की भीषणता को समझाने में पर्याप्त हैं। नवंबर 1962 में लद्दाख में रेज़ांगला की लड़ाई में चीनी मशीन गन की स्थिति पर गुलाब सिंह ने सीधे हमला किया। इस लड़ाई में उस दिन अमर होने वाले 114 भारतीय सैनिकों में से एक नाइक गुलाब सिंह भी थे जो हरियाणा रेवाड़ी के मनेठी गाँव में पैदा हुए थे। इस टुकड़ी के 120 वीरों की वजह से ही आज लद्दाख भारत का हिस्सा बना हुआ है।
मेजर-जनरल इयान कार्डोज़ो अपनी पुस्तक "परम वीर, अवर हीरोज इन बैटल" में लिखते हैं:
जब रेज़ांग ला को बाद में बर्फ हटने के बाद फिर से देखा गया तो खाइयों में मृत जवान पाए गए जिनकी उँगलियाँ अभी भी अपने हथियारों के ट्रिगर पर थी ... इस कंपनी का हर एक आदमी कई गोलियों या छर्रों के घावों के साथ अपनी ट्रेंच में मृत पाया गया। मोर्टार मैन के हाथ में अभी भी बम था। मेडिकल अर्दली के हाथों में एक सिरिंज और पट्टी थी जब चीनी गोली ने उसे मारा ...। सात मोर्टार को छोड़कर सभी को एक्टिव किया जा चुका था और बाकी सभी मोर्टार पिन निकाल दागे जाने के लिए तैयार थे। यह संसार का सबसे भीषण लास्ट स्टैंड वारफेयर था जहाँ 120 वीरों ने वीरता से लड़ते हुए 1300 चीनी सैनिकों को मार डाला था और लद्दाख को चीन द्वारा कब्जाने के मसूबों पर पानी फेर दिया।

स्वतंत्रता की कीमत चुकानी होती है, यह मुफ़्त में नहीं मिलती ...
#जयहिन्द
#जयहिंदकीसेना

14/01/2023

जब आप 23 साल में सोना मोना बाबू कर रहे हैं। उस उम्र में एक क्रांतिकारी देश के युवाओं में इंकलाब भर रहा था। उसकी सोच को समझने के लिए 70 साल के गांधी को नहीं 23 साल के भगत सिंह जी को पढ़िए। गांधी जी को जवाब देने के लिए क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा जी और भगत सिंह द्वारा जेल में लिखा गया उनका प्रसिद्ध लेख 'बम दर्शन' पढ़िए। यकीन मानिए आप बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

23 दिसम्बर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वायसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गांधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख ‘बम की पूजा’ लिखा, जिसमें उन्होंने अंग्रेज वायसराय को देश का शुभचिंतक और भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे नवयुवक क्रांतिकारियों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा। इसी के जवाब में हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा की ओर से भगवती चरण वोहरा ने “बम का दर्शन” लेख लिखा, जिसका शीर्षक “हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र” रखा। भगत सिंह ने जेल में इसे अन्तिम रूप दिया। 26 जनवरी, 1930 को इसे देश भर में बांटा गया। यह पूरा लेख यहां पोस्ट नहीं कर सकता लेकिन आपको गूगल पर सर्च करने पर आसानी से मिल जाएगा और आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए

#भगतसिंह

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