26/07/2024
और न जाने किस शहर को
जरुरतें ले जायेंगी
कोई खाली-सी कोठरी फिर से
यादों को बुनेगी
एक उम्र गुज़र जायेगा
घर लौटना न होगा
ख़्वाब, ख़्वाहिशें और जरुरत
हमें मुसाफिर बनाकर छोड़ेंगी
किसी मकां को घर बनाते-बनाते
ज़िंदगी बीत जायेगी
और न जाने किस शहर को
जरुरतें ले जायेंगी ❤
'सोच'