26/07/2023
दुरूद में हम जिन "आले मुहम्मद" के लिये दुआ करते हैं वो कौन हैं ??.... इस बारे में 2015 से बार बार आपको बताता आ रहा हूँ कि "क़ुरआन में देखें तो पता चलता है कि "आल" का मतलब सिर्फ किसी की जैविक संतान नहीं बल्कि जब ये शब्द "आल" विशेषकर किसी कौम के सरदार, किसी लीडर या किसी महात्मा से जोड़कर बोला जाए, तो समझ लीजिए कि उस सरदार के समस्त अनुयायियों को उस सरदार की आल कहा गया है
उदाहरण के लिए देखिए कुरान 40:46 मे फिरऔन की आल को मौत के बाद दण्ड का ज़िक्र है, लेकिन इस्लामी ज्ञान रखने वाले दोस्त जानते होंगे कि फिरऔन नि:संतान था और फिरऔन की पत्नी एक पुण्यात्मा थी, यानी यहाँ न फिरऔन की जैविक संतानों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है, न उसके परिवार को बल्कि फिरऔन के उन अनुयायियों को दण्डित किए जाने का ज़िक्र है..." ... किसी बड़ी शख्सियत की "आल" का मतलब उसके पैरोकार होते हैं.... क़ुरआन में आले फ़िरऔन, फ़िरऔन के पैरोकारों को कहा गया है, जो फ़िरऔन के हुक्म पर लोगों पर जुल्म करते थे, इसलिये अल्लाह ने आले फ़िरऔन को समंदर में ग़र्क कर दिया और अब आले फ़िरऔन पर हर सुबह शाम आग का अज़ाब होता है, ये क़ुरआन में लिखा है !! .... और देखिए,.. दुरूद ए इब्राहीमी में हम कहते हैं कि अल्लाह हम पर उस तरह रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमा, जिस तरह इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आल पर तूने बरकत और रहमत नाज़िल फ़रमाई....!!.. अब बताइये इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आल अगर उनकी तमाम औलाद समझी जाए तो तमाम यहूदी ईसाई और अरब के सारे मुशरिक भी इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आल थे, अब इनमें तो ज़्यादातर गुमराह कौमें हैं, क्या हम अल्लाह से इनके जैसा बनने की दुआ कर रहे हैं ???... असल में दुरूद ए इब्राहीमी में उनकी आल का मतलब उनकी तमाम औलाद नही बल्कि उनके तमाम पैरोकारों की बात है कि जिन्होंने भी इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन की पैरवी की अल्लाह ने उन सब पर बरकतें और रहमतें नाज़िल फरमाईं..... उसी तरह आले मुहम्मद का मतलब मुहम्मद सल्ल० के तमाम पैरोकार हैं...!!... आल ए मोहम्मद सल्ल० का मतलब सिर्फ आप सल्ल० की जैविक सन्तानों से लेना ठीक नही, बेशक़ जो ईमान वाले नेक सैयद हैं वो अपने ईमान और अख़लाक़ की बदौलत हमारे लिए मोहतरम ही हैं.... लेकिन यहां पर "सैयद वसीम रिज़वी" जैसे तथाकथित सैयदों की भी कमी नही जो सहाबा और इस्लाम के ख़िलाफ़ बुग्ज़ में डूबे हुए हैं.... !! बेहतर होगा, इस गैरइस्लामी सैयदवाद से बाहर निकलिये कि नबी के वंश को अल्लाह ज़्यादा पसन्द करता है, .... ऐसा कुछ भी हमें क़ुरआन नही बताता, ... दोबारा याद कीजिये क़ुरआन में नूह अलैहिस्सलाम के बेटे का वाकया, जो था तो नूह अलैहिस्सलाम का अज़ीज़ बेटा लेकिन उसके आमाल बुरे थे, वो ईमान से क़ाफ़िर था, इसलिये अल्लाह ने उसे तूफान में ग़र्क कर दिया, और जब नूह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह से कहा कि "या अल्लाह मेरा बेटा है, मेरे घरवालों मे से था, और तेरा वादा सच्चा है ... तो अल्लाह की ओर से जवाब आया कि वो आपके घरवालों मे से नहीं था, और ऐसी बात न कहिए जिस बात का आपको ज्ञान न हो [कुरआन 11:45-46] ... यानी क़ुरआन में अल्लाह खुले तौर पर बता रहा है कि नबी के सगे बेटे को भी अल्लाह नबी की निस्बत से कोई रियायत नही देने वाला अगर उसका ईमान और आमाल दुरुस्त न हों तो... अब सोचिये, अल्लाह के यहां नबी के सगे बेटे की रियायत नही... और आपको ये गुमान है कि हज़ारों साल बाद के ये "सय्यद" कुछ भी करते रहें, दूसरी नस्लों के ईमान वाले मुसलमानों के मुकाबले अल्लाह को ये सय्यद ज़्यादा प्यारे हैं..... ... आपका गुमान गलत है !!
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