Rajan movie

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03/09/2024

सीताराम

जय वीर हनुमान

शास्त्रों मे हर देवता के लिए भिन्न -भिन्न दीपक जलाने का विधान है। जानिए ! किस देवता के लिए कौन सा दीपक जलाना चाहिए ।

किस देवता या ग्रह के लिए कौन सा दीपक जलाएं ?

जब हम किसी देवता का पूजन करते हैं। तो सामान्यतः दीपक जलाते हैं। दीपक किसी भी पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है। हमारे मस्तिष्क में सामान्यतया घी अथवा तेल का दीपक जलाने की बात आती है। और हम जलाते हैं। जब हम धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की साधना अथवा सिद्धि के मार्ग पर चलते हैं। तो दीपक का महत्व विशिष्ट हो जाता है। दीपक कैसा हो, उसमे कितनी बत्तियां हों , इसका भी एक विशेष महत्त्व है। उसमें जलने वाला तेल व घी किस-किस प्रकार का हो, इसका भी विशेष महत्त्व है। उस देवता की कृपा प्राप्त करने और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।

1. हमें आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।

हमें शत्रुओं से पीड़ा हो तो सरसों के तेल का दीपक भैरव जी के सामने जलाना चाहिये।

भगवान सूर्य की प्रसन्नता के लिए घी का दीपक जलाना चाहिए ।

शनि के लिए सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

पति की दीर्घायु के लिए गिलोय के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

राहु तथा केतु ग्रह के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

किसी भी देवी या देवता की पूजा में गाय का शुद्ध घी तथा एक फूल बत्ती या तिल के तेल का दीपक आवश्यक रूप से जलाना चाहिए।

भगवती जगदंबा व दुर्गा देवी की आराधना के समय एवं माता सरस्वती की आराधना के समय तथा शिक्षा-प्राप्ति के लिए दो मुखों वाला दीपक जलाना चाहिए।

भगवान गणेश की कृपा-प्राप्ति के लिए तीन बत्तियों वाला घी का दीपक जलाना चाहिए।

भैरव साधना के लिए सरसों के तेल का चैमुखी दीपक जलाना चाहिए।

मुकदमा जीतने के लिए पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए।

भगवान कार्तिकेय की प्रसन्नता के लिए गाय के शुद्ध घी या पीली सरसों के तेल का पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए ।

भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए आठ तथा बारह मुखी दीपक पीली सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए।

लक्ष्मी जी की प्रसन्नता के लिए घी का सात मुखी दीपक जलाना चाहिए।

भगवान विष्णु की दशावतार आराधना के समय दस मुखी दीपक जलाना चाहिए।

इष्ट-सिद्धि तथा ज्ञान-प्राप्ति के लिए गहरा तथा गोल दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।

शत्रुनाश तथा आपत्ति निवारण के लिए मध्य में से ऊपर उठा हुआ दीपक प्रयोग में लेना चाहिए।

लक्ष्मी-प्राप्ति के लिए दीपक सामान्य गहरा होना चाहिए।

हनुमानजी की प्रसन्नता के लिए तिकोने दीपक का प्रयोग करना चाहिए और उसमें चमेली के तेल का प्रयोग करना चाहिए।

दीपक कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे मिट्टी, आटा, तांबा, चांदी, लोहा, पीतल अथवा स्वर्ण धातु का। मूंग, चावल, गेहूं, उड़द तथा ज्वार को समान भाग में लेकर उसके आटे से बना दीपक सभी प्रकार की साधनाओं में श्रेष्ठ होता है। किसी-किसी साधना में अखंड ज्योति जलाने का भी विशेष विधान है। जिसे गाय के शुद्ध घी और तिल के तेल के साथ भी जलाया जा सकता है। यह प्रयोग विशेषत: आश्रमों और देव स्थानों के लिए करना चाहिए।

अगर हमें आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो तो नियम पूर्वक अपने घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।

तुम्हारी सफलता की परिभाषा ही गलत है।  तुमने भौतिकता को प्राप्त कर लेना ही सफलता समझ लिया है। जैसे कि बड़ा घर बड़ी नौकरी ...
02/10/2023

तुम्हारी सफलता की परिभाषा ही गलत है। तुमने भौतिकता को प्राप्त कर लेना ही सफलता समझ लिया है। जैसे कि बड़ा घर बड़ी नौकरी कार पद प्रतिष्ठा सम्मान ऐश्वर्य आदि आदि। 🌺🌺🌹🌹

जबकि वास्तविक अर्थों में सफलता यह नहीं है। वास्तविक सफलता है परमात्म रूपी आनंद को जीवन में प्राप्त करना और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस जीवन मरण के चक्र से मुक्त होना ताकि ईश्वरीय सत्ता से मिलन हो सके और कर्मों के बंधन से जीव अर्थात् हम और आप मुक्त हो जायें। 🌷🌷

जीवन में जो जैसा हो रहा है उसे उसी रूप में स्वीकार करें। और ब्रह्मचर्य, योग , प्राणायाम साथ में ब्राह्म मुहूर्त में अवश्य ही अपने शय्या का त्याग करें। जीवन में नवीन उत्साह 1 वर्ष के अंदर ही देखने को प्राप्त होगा ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

।।जय जय श्री राधे।।

‼️पण्डित श्रवण मिश्र ‼️

#भगवद् धारा __💐🙏

बहुत बहुत शुभकामनाएं 🌹🌹
19/09/2023

बहुत बहुत शुभकामनाएं 🌹🌹

तिलक की महिमा...वैदिक सभ्यता के अनुसार सनातन धर्मी माथे पर कुछ चिन्ह लगाते हैं, जिसे तिलक कहा जाता है। तिलक अनेक प्रकार ...
16/09/2023

तिलक की महिमा...

वैदिक सभ्यता के अनुसार सनातन धर्मी माथे पर कुछ चिन्ह लगाते हैं, जिसे तिलक कहा जाता है। तिलक अनेक प्रकार के होते हैं, कुछ राख द्वारा बनाये हुए, कुछ मिट्टी से, कुछ कुम-कुम आदि से।

माथे पर राख द्वारा चिन्हित तीन आड़ी रेखाऐं दर्शाती हैं कि लगाने वाला शिव-भक्त है। नाक पर तिकोन और उसके ऊपर “V” चिन्ह यह दर्शाता है कि लगाने वाला विष्णु-भक्त है।

तिलक हमारे शरीर को एक मंदिर की भाँति अंकित करता है, शुद्ध करता है और बुरे प्रभावों से हमारी रक्षा भी करता है। इस तिलक को हम स्वयं देखें या कोई और देखे तो उसे स्वतः ही श्री कृष्ण का स्मरण हो आता है।

अगर कोई वैष्णव जो उर्धव-पुन्ड्र लगा कर किसी के घर भोजन करता है, तो उस घर के २० पीढ़ियों को मैं (परम पुरुषोत्तम भगवान) घोर नरकों से निकाल लेता हूँ। – (हरी-भक्तिविलास ४.२०३, ब्रह्माण्ड पुराण से उद्धृत)...

हे पक्षीराज! (गरुड़) जिसके माथे पर गोपी-चन्दन का तिलक अंकित होता है, उसे कोई गृह-नक्षत्र, यक्ष, भूत-पिशाच, सर्प आदि हानि नहीं पहुंचा सकते।– (हरी-भक्ति विलास ४.२३८, गरुड़ पुराण से उद्धृत)

जिन भक्तों के गले में तुलसी या कमल की कंठी-माला हो, कन्धों पर शंख-चक्र अंकित हों, और तिलक शरीर के बारह स्थानों पर चिन्हित हो, वे समस्त ब्रह्माण्ड को पवित्र करते हैं। – पद्म पुराण

किसी भी स्थिति में, तिलक का परम उद्देश्य अपने आप को पवित्र और भगवान के मंदिर के रूप में शरीर को चिन्हित करने के लिए है । शास्त्र विस्तार से यह निर्दिष्ट नहीं करते कि तिलक किस ढंग से किये जाने चाहिए। यह अधिकतर आचार्यों द्वारा शास्त्रों में वर्णित सामान्य प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए बनायीं गयी हैं ।

पद्मपुराण के उत्तर खंड में भगवान शिव, पार्वती जी से कहते हैं कि वैष्णवों के “V” तिलक के बीच में जो स्थान है उसमे लक्ष्मी एवं नारायण का वास है। इसलिए जो भी शरीर इन तिलकों से सजा होगा उसे श्री विष्णु के मंदिर के समान समझना चाहिए ।

पद्म पुराण में एक और स्थान पर

वाम्-पार्श्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे च सदाशिवः ।
मध्ये विष्णुम् विजनियात तस्मान् मध्यम न लेपयेत् ।।

तिलक के बायीं ओर ब्रह्मा जी विराजमान हैं, दाहिनी ओर सदाशिव परन्तु सबको यह ज्ञात होना चाहिए कि मध्य में श्री विष्णु का स्थान है। इसलिए मध्य भाग में कुछ लेपना नहीं चाहिए।

तिलक कैसे लगाया जाए...

बायीं हथेली पर थोड़ा सा जल लेकर उस पर गोपी-चन्दन को रगड़ें। तिलक बनाते समय पद्म पुराण में वर्णित निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें:

ललाटे केशवं ध्यायेन, नारायणम् अथोदरे, वक्ष-स्थले माधवम् तु, गोविन्दम कंठ-कुपके, विष्णुम् च दक्षिणे कुक्षौ, बहौ च मधुसूदनम्, त्रिविक्रमम् कन्धरे तु, वामनम् वाम्-पार्श्वके, श्रीधरम वाम्-बहौ तु, ऋषिकेशम् च कंधरे, पृष्ठे-तु पद्मनाभम च, कत्यम् दमोदरम् न्यसेत्,
तत प्रक्षालन-तोयं तु, वसुदेवेति मूर्धनि...

माथे पर – ॐ केशवाय नमः
नाभि के ऊपर – ॐ नारायणाय नमः
वक्ष-स्थल – ॐ माधवाय नमः
कंठ – ॐ गोविन्दाय नमः
उदर के दाहिनी ओर – ॐ विष्णवे नमः
दाहिनी भुजा – ॐ मधुसूदनाय नमः
दाहिना कन्धा – ॐ त्रिविक्रमाय नमः
उदर के बायीं ओर – ॐ वामनाय नमः
बायीं भुजा – ॐ श्रीधराय नमः
बायां कन्धा – ॐ ऋषिकेशाय नमः
पीठ का ऊपरी भाग – ॐ पद्मनाभाय नमः
पीठ का निचला भाग – ॐ दामोदराय नमः

अंत में जो भी गोपी-चन्दन बचे उसे ॐ वासुदेवाय नमः का उच्चारण करते हुए शिखा में पोंछ लेना चाहिए।

राधे राधे - जय श्री कृष्ण 🙏

कुशोत्पाटिनी अमावस्या आज*************************भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशोत्पतिनी अमावस्या, भाद्रपद अमाव...
13/09/2023

कुशोत्पाटिनी अमावस्या आज
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भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशोत्पतिनी अमावस्या, भाद्रपद अमावस्या व पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पुरोहित वर्ष भर कर्मकाण्ड कराने के लिए, नदी, घाटियों से कुशा नामक घास उखाड़ कर घर लाते है। कुशा घास को उत्तराखंड में कांस कहते है। कुशा का वैज्ञानिक नाम एराग्रोस्टिस सिनोसुरोइड्स कहते है।

धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाए तो वह वर्ष भर तक पुण्य फलदायी होती है। बिना कुशा घास के कोई भी धार्मिक पूजा निष्फल मानी जाती है। इसलिए कुशा घास का उपयोग हिन्दू पूजा पद्धति में प्रमुखता से किया जाता है। इस दिन तोड़ी गई कोई भी कुशा वर्ष भर पवित्र रहती हैं।

कुशोत्पाटिनी अमावस्या का महत्व
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ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि सही व शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य कभी निष्फल नहीं होता, उसके सफल होने की पूर्ण संभावना होती है। ऐसे कई विशेष मुहूर्त होते हैं जैसे गुरुपुष्य, रविपुष्य, सर्वार्थसिद्धि योग, त्रिपुष्कर योग आदि। शास्त्रानुसार हमारे हिन्दू कर्मकांडों में 'पावित्री का विशेष महत्व बताया गया है। बिना पावित्रीधारण किए कोई कर्मकांड पूर्ण नहीं माना जाता है।

'पावित्री कुशा से बनी अंगूठी अथवा स्वर्ण से बनी अंगूठी को कहा जाता है। 'पावित्री बनाने के लिए कुशा को उखाड़ा जाता है। यह कार्य केवल अमावस्या को ही संपन्न किया जाता है। अमावस्या को उखाड़ा गया कुशा एक माह तक पवित्र व शुद्ध माना गया है। शास्त्रानुसार तीर्थ स्नान, संध्योपासन, पूजन, जप, होम, पितृकर्म, तर्पण आदि में पावित्री धारण करना आवश्यक है।

'पावित्री धारण के नियम-
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- स्वर्ण से बनी 'पावित्री (अंगूठी) कुशा की पावित्री' से अधिक शुद्ध मानी जाती है।
- 'पावित्री' पहनकर भोजन करने से उसका त्याग करना आवश्यक होता है।
- दो कुशों से बनी 'पावित्री' को दाहिने हाथ की अनामिका के मूल में धारण किया जाता है।
- तीन कुशों से बनी 'पावित्री' को बाएं हाथ की अनामिका के मूल में धारण किया जाता है।

कुशोत्पाटन (कुशा उखाड़ने) के नियम-
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- प्रत्येक मास की अमावस्या को उखाड़ा गया कुश एक माह तक शुद्ध व उपयोगी रहता है।

- भाद्रपद मास की अमावस्या जिसे कुशोत्पाटनी अमावस्या कहा जाता है, इस दिन उखाड़ा गया कुश एक वर्ष तक पवित्र व उपयोगी होता है, इसीलिए 'कुशोत्पाटिनी' अमावस्या का विशेष महत्व होता है।

- कुश को सदैव 'हुं फट्' बीज मंत्र के उच्चारण के साथ एक बार में उखाड़ना चाहिए। जिस कुशा का अग्रभाग कटा हो, जो मार्ग में हो, जो अशुद्ध स्थान में हो ऐसे कुश को नहीं उखाड़ना चाहिए।

- कुशा को उखाड़ते समय श्वेत वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाड़ना चाहिए।

- कुशा सदैव प्रात:काल ही उखाड़ना चाहिए।

कुशोत्पाटनी अमावस्या तिथि
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इस वर्ष 14 सितंबर 2023, दिन गुरुवार, भाद्रपद मास की 'कुशोत्पाटनी अमावस्या' है। जो साधक साधना एवं कर्मकांड के लिए कुशोत्पाटन करना चाहते हैं वे इस दिन उपर्युक्त विधि से कुशोत्पाटन कर सकते हैं।

Il जय श्री राम ll

09/09/2023

📢गया श्राद्ध पितृ पक्ष में किया जाता है
आपके पित्र आस लगाकर बैठे रहते हैं
और यह कहते हैं कि कोई तो मेरे घर में ऐसे दिव्य व्यक्ति जन्म लेगा जो गयाजी में हमें मुक्ति दिलाएगा

अकाल मृत्यु से जिनका प्राण छूटता है तन से, वह प्रेत योनि को प्राप्त करते हैं प्रेत आत्मा जब तक गया श्राद्ध नहीं होता है तब तक घर के परिजनों को नुकसान पहुंचाता है कोर्ट कचहरी केस मुकदमा कर्ज घर में कलेश रोग बीमारी अशांति पैदा करता है प्रेत आत्मा प्रेत आत्मा को शांति गयाजी में अवश्य करना चाहिए

गया श्राद्ध करने से 121कूल और 7 गोत्र का उद्धार होता हैं

शुद्धता पूर्ण तरीके से वैदिक रीति रिवाज से पित्र को धार करने के लिए गया जी में आए और पितरो को गति मुक्ति दिलाएं

सभी सत्य सनातन प्रेमियों को भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्योत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं...सभी प्रेमियों से आग्रह है कि तन से...
05/09/2023

सभी सत्य सनातन प्रेमियों को भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्योत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं...सभी प्रेमियों से आग्रह है कि तन से भले ही संसार मे रहो लेकिन मन से भगवान के चरणों का स्मरण सदैव करते रहो, नाम जपते रहो।। श्री भगवान गीता में कहते हैं-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

🙏💗जय श्री कृष्ण💗🙏राधे राधे💓🙏

29/06/2023

📷राजन मूवीज📷
आगामी सीजन की बुकिंग सुरु
☎️9870630753

श्री सुंदर कांड का पाठ विश्नोई परिवार मे पंडित राजन कौशिकसंपर्क सूत्र-9870630753       7351097560
20/04/2023

श्री सुंदर कांड का पाठ विश्नोई परिवार मे
पंडित राजन कौशिक
संपर्क सूत्र-9870630753
7351097560

🌹जय श्री राम 🌹
20/04/2023

🌹जय श्री राम 🌹

जय माता दी
20/04/2023

जय माता दी

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28/12/2022

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