MANOJ SAXENA

MANOJ SAXENA ऐसा नही है कि जिंदगी नही जिया हूं मैं
मैंने भी उड़ाई है तेज़ आंधियों में पॉलीथिन धागे से बांधकर
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12/10/2024

❤️

जो कुछ थे, वो कुछ नहीं है आजकलजो कुछ नहीं थे, वो कुछ है आजकलसमय का फेर है ये जो कुछ नहीं है वो कुछ ना रहेंगे जो कुछ है व...
22/03/2023

जो कुछ थे, वो कुछ नहीं है आजकल
जो कुछ नहीं थे, वो कुछ है आजकल

समय का फेर है ये

जो कुछ नहीं है वो कुछ ना रहेंगे
जो कुछ है वो भी कुछ नहीं रहेंगे..

पैसे भी है, और मन भी बहुत है कमबख़्त !संजोग नहीं बन पा रहा भुट्टा खाने का कुछ अलग ही तरहा की गरीबी है ये ऐसा लगता है !जै...
30/08/2022

पैसे भी है, और मन भी बहुत है
कमबख़्त !
संजोग नहीं बन पा रहा भुट्टा खाने का

कुछ अलग ही तरहा की गरीबी है ये
ऐसा लगता है !
जैसे मन को मार लिया जाता है किन्ही अनजानी वजहों से
े_परे

बेपनहा बातें, बहुत से ख़्याल, ना जाने कितने, सवालअभी बाकी हैं |होना मेरे हिस्से में बवाल अभी बाकी है |मेरी आरजू है के ते...
04/07/2022

बेपनहा बातें, बहुत से ख़्याल,
ना जाने कितने, सवाल
अभी बाकी हैं |

होना मेरे हिस्से में बवाल
अभी बाकी है |

मेरी आरजू है के तेरे बिन मैं
मर जाऊं
मगर तेरा दूर हो जाना
अभी बाकी हैं |

तू मेरा हो ना सके गम भी
मगर मैं तेरा ना रहूं
बात ये, निभानी
अभी बाकी है |

और सुना है इश्क की जात
झूठी है आजकल
ये बात झूठ है, बताना
अभी बाकी है |

असुविधाएं आपकी क्षमता को चरम सीमा तक ले जाने का काम करती है जबकि सुविधाएं अभी रुक जाने को कहेंगी |
27/06/2022

असुविधाएं
आपकी क्षमता को चरम सीमा तक ले जाने का काम करती है जबकि सुविधाएं अभी रुक जाने को कहेंगी |

“सुख चैन की ठंडी छाँव तलेमुश्किल है यार बसर मेरा महलों में कबूतर रहते हैं मैं बाज़ हूँ परबत घर मेरा!रण स्वाभिमान का लड़न...
30/04/2022

“सुख चैन की ठंडी छाँव तले
मुश्किल है यार बसर मेरा
महलों में कबूतर रहते हैं
मैं बाज़ हूँ परबत घर मेरा!

रण स्वाभिमान का लड़ने को
मैं एक अकेला काफ़ी हूँ
इक हिम्मत है तलवार मेरी
दो बाज़ू हैं लश्कर मेरा.

कैसे सुलझे ? कितने उलझ गए है ?तुमपे ! तुझमें ! तुझसे ! यूं बहुत से !
24/02/2022

कैसे सुलझे ? कितने उलझ गए है ?
तुमपे ! तुझमें ! तुझसे ! यूं बहुत से !

मेरा ये अहम,जो मुझमे रम सा गया है,परत दर परत,जो मुझमे जम सा गया है,मुझ पर भी अब,ये अधिकार जमाने लगा है,इस दुनिया को,नज़रो...
03/12/2021

मेरा ये अहम,
जो मुझमे रम सा गया है,
परत दर परत,
जो मुझमे जम सा गया है,
मुझ पर भी अब,
ये अधिकार जमाने लगा है,
इस दुनिया को,
नज़रों से मेरी गिराने लगा है,

कौन अच्छा है,
और कौन बुरा,
क्या सही है,
और क्या गलत,
कौन अपना है,
और कौन पराया,
यह सब तय करने वाला,
आखिर ये अहम होता कौन है,
इस अहम से अलग,
एक और शख्सियत है मेरी,
इस अहम को,
बस अब यही सच बतलाना है,

हाँ,
इस अहम को जानने में,
इस अहम को पहचानने में,
कुछ देरी जरूर हुई है,
पर हौंसला अभी भी बाकी है,
मेरे पंखों में जान अभी भी बाकी है,
एक नई उड़ान अभी भी बाकी है,
मैं अब तलक हारा नही हुँ,

अब अपने ही,
इस अहम के खिलाफ,
एक नई जंग है मेरी,
इसकी परतों को हटाना,
अब जिद्द है मेरी,
वक़्त लगेगा जरूर,
पर एक दिन जीत जाऊंगा,
आज जो सर चढ़ बैठा है,
इसी अहम को पैरों पर लाऊंगा..

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