02/02/2021
यात्रा का आयोजन करते करते मैं कब बूढ़ा हो गया पता ही नही चला। चहेरे के होंठ के आसपास जो स्मित मेरी छाई हुई रखी है, वो मेरे बूढ़ा होने की निशानी है। वैराग्य सा मेरा जीवन, ये फ़ोटो खिंचने वाला जी रहा था। और जो हूबहू मेरी चिंता की लकीरें, मेरा सारा जिया हुआ, खोया हुआ उसके चेहरे पे दिखाई दिया। यानी कि जब भी हम किसीसे संवाद करते हैं वो हम नही, वो सामनेवाला बन जाते हैं। चाहते, ना चाहते हुए भी हमारा पूरा जीवन उनके सामने प्रतीत हो जाता है।